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विषय सूची
१. प्रस्तावना
संस्कृत सनातन हिन्दूधर्म के पवित्र एवं धार्मिक ग्रंथों के लेखों में उपयोग की जानेवाली मुख्य भाषा है । इसी भाषा में पवित्र वेद, उपनिषद, पुराण, रामायण, महाभारत एवं श्रीमद्भगवद्गीता की मूल रचना की गई है । ये पवित्र एवं धार्मिक ग्रंथ भारत की समृद्ध आध्यात्मिक धरोहर (विरासत) को दर्शाते हैं । कालांतर में इन धार्मिक ग्रंथों का अनुवाद/भाषांतरण अनेक भाषाओं में हुआ जिसके फलस्वरूप पूरे विश्व में लोगों द्वारा इन्हें प्राप्त करना एवं इनका अध्ययन करना संभव हो पाया । जब किसी पवित्र एवं धार्मिक ग्रंथ का अनुवाद किया जाता है तब यह भी संभव है कि भाषांतरित रचना का प्रभाव मूल रचना जितना न पडे । सितंबर २०१६ तक, परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी द्वारा रचित लगभग ३०० आध्यात्मिक ग्रंथों का १५ से अधिक भाषाओं में अनुवाद करने की प्रक्रिया में महर्षि अध्यात्म विश्वविद्यालय का सहभाग रहा है । अनुवाद करने की प्रक्रिया में हमने अनेक बाधाओं का सामना किया, जिनमें दो मुख्य बाधाओं का आगे उल्लेख किया गया है :
१. सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक सिद्धांतों के अनुसार अन्य भाषा में शब्दों को ठीक प्रकार से अनुवाद करने की अनुवादकर्ता की क्षमता ।
२. प्रत्येक भाषा के अपने आध्यात्मिक स्पंदन होते हैं जो वाचक पर साहित्यिक कार्य की प्रभावकारिता को अल्प अथवा अधिक कर सकते हैं ।
उपरोक्त दानों बिंदुओं में द्वितीय के संबंध में बहुत थोडे लोग ही जानते हैं । उपरोक्त दानों बिंदुओं में द्वितीय के संबंध में बहुत थोडे लोग ही जानते हैं ।
प्राचीन भारत के ऋषि-मुनियों ने पवित्र एवं धार्मिक ग्रंथों के लेखन में संस्कृत भाषा का उपयोग क्यों किया ?
वस्तुओं एवं सिद्धांतों का वर्णन करने वाले शब्दों की ध्वनि / उच्चारण से संबंधित प्रत्येक भाषा की शैली भिन्न होती हैं । यद्यपि कुछ जातिगत लिपियां जैसे, लैटिन, चीनी, अरबी, देवनागरी, साइरिलिक आदि हैं जिनमें प्रत्येक जातिगत लिपि के अंतर्गत आने वाली विभिन्न भाषाओं की लिपियां, उनके प्रयोग एवं स्वरूप की दृष्टि से भिन्न होती हैं । क्या स्वर-विज्ञान एवं लिपि के मध्य संबंध का भाषा के सकारात्मक स्पंदनों की वृद्धि होने में कोई अंतर पडता है ।
महर्षि अध्यात्म विश्वविद्यालय एवं एसएसआरएफ में जागृत छठवीं इंद्रिय की सहायता से किए जाने वाले आध्यात्मिक शोध के अतिरिक्त हमने संस्कृत भाषा पर भी जैव प्रतिपुष्टि प्रणाली द्वारा गहन अनुसंधान किया है । इस अनुसंधान/अध्ययन में हमने इस उपकरण का उपयोग निम्न परिकल्पना को सिद्ध करने के लिए अनेक प्रयोगों को करने में किया,
अनेक प्रयोग जो हमने जैव प्रतिपुष्टि उपकरण के माध्यम से किए उनका स्वतंत्र विश्लेषण हमारे उन साधकों ने भी किया है जिनकी छठवीं इंद्रिय जागृत है । ये साधक अपनी स्वाभाविक क्षमता तथा गहन साधना के बल पर उन स्पंदनों को भी अनुभव कर सकते हैं जिन्हें सामान्य मनुष्य अनुभव नहीं कर सकता । ये साधक स्वयं को अनुभव होनेवाले स्पंदनों का चित्रांकन करते हैं तथा वे चित्र सूक्ष्म चित्र कहलाते हैं । हमने शोध में पाया कि जैविक प्रतिपुष्टि उपकरण द्वारा प्राप्त परिणाम हमारे सूक्ष्म को देखनेवाले साधकों द्वारा निर्मित सूक्ष्म चित्रों की समान रूप से पुष्टि करते हैं ।
२. कार्य पद्धति
२.१ जैव प्रतिपुष्टि प्रणाली/उपकरणों का संस्कृत भाषा के अनुसंधान/शोध अध्ययन में प्रयोग
हमने इस परिकल्पना का परीक्षण करने के लिए जैव प्रतिपुष्टि प्रणाली/उपकरण का उपयोग किया कि पवित्र एवं धार्मिक ग्रंथ की रचना के लिए संस्कृत सर्वोत्कृष्ट भाषा है एवं यह दृष्य-श्रवण स्तर पर तथा सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण आध्यात्मिक स्तर पर इसका प्रभाव मानव पर अति सकारात्मक होता है । इस शोधपत्र में हमने पालीकॉनट्रास्ट इंटरफरेंस चित्रण/फोटोग्राफी (PIP) नामक एक यंत्र की सहायता से किए गए शोध कार्य को प्रस्तुत किया है तथा नीचे हमने इस प्रणाली/उपकरण का संक्षिप्त उल्लेख किया है । इस तकनीक के प्रस्फुटक/विकासात्मक (डेवलपर) द्वारा इंगित रंगों के संबंध में अधिक जानकारी हमने PIP तकनीक के लेख में दी है ।
प्रत्येक उपकरण का उपयोग करने के अपने नियम होते हैं तथा प्रयोग के समय हम उनका पालन करने हेतु विशेष ध्यान रखते हैं ।
पालीकॉनट्रास्ट इंटरफरेंस चित्रण/फोटोग्राफी (PIP)
पिछले अनेक दशकों से वस्तु अथवा व्यक्ति के चारों ओर विद्यमान ऊर्जा क्षेत्र के अध्ययन हेतु विभिन्न उपकरणों अथवा विशेष तकनीकों की सहायता से प्रयास किए जा रहे हैं । किरीलियम चित्रण प्रणाली में प्रयुक्त तकनीक के आधार पर हैरी ओल्ड फील्ड नामक एक वैज्ञानिक एवं आविष्कारक ने उसी तकनीक पर शोध किया तथा उसे नए एवं सरलता से प्रयोग किए जाने वाले प्रारूप में प्रस्तुत किया । जिसे पालीकॉनट्रास्ट इंटरफरेंस फोटोग्राफी, अर्थात (PIP) कहा जाता है । ऊर्जा क्षेत्र के परीक्षण हेतु उपलब्ध विभिन्न प्रणालियों में PIP प्रणाली को अधिक प्रभावशाली माना जाता है । PIP प्रणाली में ऊर्जा क्षेत्र की वीडियो इमेजिंग प्रक्रिया की जाती है । इस नई प्रयोगात्मक तकनीक से प्रकाश के उन स्वरूपों का भी पता चलता है जो मानव नेत्र नहीं देख सकते । हेरी ओल्ड फील्ड का यह मानना था कि रोग के उपचार का भविष्य एक ऐसे प्रभावी परिलोकित्र (स्कैनर) का पता लगाने में है जो न केवल स्थूल शरीर में उपस्थित रोग का पता लगाए अपितु शरीर के ऊर्जा क्षेत्र में होने वाले असंतुलन को भी देख सके । उसने विभिन्न रंगों को दर्शाने के लिए यंत्रों का परीक्षण किया । प्रत्येक रंग का एक विशेष अर्थ बताया गया जो ऊर्जा के क्षेत्र में सकारात्मक स्पंदनों को तथा उपद्रव के स्थानों को दर्शाता है । व्यक्ति का ऊर्जा क्षेत्र उसके भविष्य के स्वास्थ्य का स्पष्ट संकेत कैसे दे सकता है यह समझने का प्रयास करनेवाले शोधकर्ताओं में यह उपकरण अत्यधिक लोकप्रिय हुआ है ।
२.२ कार्य प्रणाली से संबंधित अन्य पहलू
- इस विषय से संबंधित हमारे सभी प्रयोगों में, प्रायः हमने पहले मूल पाठ्यांक लिए । उसके उपरांत ही हमने उस मूल पाठ्यांक को तुलना प्रयोग में दिखने वाले उत्तेजक/परिवर्तन की गणना से करने का प्रयास किया ।
- प्रयोग के दौरान अन्य उत्तेजकों/उद्दीपनों ( जैसे – प्रकाश में परिवर्तन होना, तापमान आदि) का प्रभाव रोकने हेतु विशेष ध्यान रखा गया ।
- यद्यपि हमने प्रत्येक प्रयोग में बहुत अधिक सांख्यिकी जानकारी संचित नहीं की, तो भी ऐसे प्रयोग आध्यात्मिक अनुष्ठानों की प्रभावकारिता को बढाने के साथ-साथ मानवजाति तथा वातावरण के लाभ के लिए भविष्य में शोध करने हेतु एक भाषा के रूप में संस्कृत के महत्त्व पर दिशा प्रदान करते हैं ।
- PIP उपकरण के संबंध में, हमने अपना गहन अनुभव एवं अन्य उपयोगकर्ताओं के अनुभव की सहायता से इस उपकरण के मूल उपयोग से भी आगे बढकर इसका प्रयोग किया । हमने पीआईपी चित्र में दिखनेवाले विभिन्न रंगों को आध्यात्मिक दृष्टि से परिभाषित किया । आगे इसके उदाहरण दिए गए हैं :
- PIP कोष (नियम पुस्तक) के अनुसार पीला रंग सामान्य स्वास्थ्य एवं प्राण शक्ति को दर्शाता है, किंतु हमने इसे आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य से जोडकर चैतन्य अथवा ज्ञान से परिभाषित किया है ।
- किसी विशेष रंग की भिन्न आभाएं क्या दर्शाती हैं, हमने इसकी भी आगे की जानकारी दी । पीआईपी चित्रों में हरे रंग की ४ आभाओं को देखा जा सकता है किंतु पीआईपी के नियम की पुस्तक में सभी का एक ही अर्थ माना गया है । हमने अपने अनुभव के आधार पर सभी ४ आभाओं को परिभाषित किया जो चित्र दिखने वाले रंगों की आभाओं की अधिक जानकारी देता है ।
- इस विषय में अधिक जानकारी के लिए पीआईपी रंगों के रूपांतरित मानचित्र (चार्ट) को देखें ।
- जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है, हमने कुछ प्रयोगों में छठी इंद्रिय (हमारे अनुसंधान की एक विशेष सुविधा) से देखे गए चित्र भी दर्शाए हैं । जैव प्रतिपुष्टि उपकरण से प्राप्त पाठ्यांकों से रहित ये चित्र सूक्ष्म को देख पानेवाले साधकों द्वारा अपनी जागृत छठवीं इंद्रिय के प्रयोग से निर्मित किए गए हैं ।