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१. हमारा उद्देश्य क्या है ?

एस.एस.आर.एफ का उद्देश्य है – समाज को आध्यात्मिक विश्व और हमारे जीवन पर उसके प्रभावके विषय में ज्ञान प्रदान करना । हम आध्यात्मिक विश्व के संबंध में शोध करते हैं तथा उसके विषय में लोगों को सरल भाषा में ज्ञान प्रदान करते हैं और समझाते हैं, जिज्ञासुआें को स्वयं आध्यात्मिक अनुभूति लेने के लिए प्रेरित करते हैं तथा जिनमें आध्यात्मिक प्रगति एवं ईश्वरप्राप्ति की तीव्र लगन है, उन्हें अपना ध्येय साध्य करने हेतु मार्गदर्शन करते हैं ।

२.  एस.एस.आर.एफ किसके लिए है ?

एस.एस.आर.एफ उस प्रत्येक जिज्ञासु के लिए है जो आध्यात्मिक विश्‍व को समझना चाहता है । समय-समय पर जिनको संदेह है वे हमसे आध्यात्मिक विश्‍व के अस्तित्व की संभावना के विषय में ही प्रश्‍न करते हैं । SSRF को विश्‍वास है कि आध्यात्मिक विश्‍व का अस्तित्व है और वह हमारे दैनिक जीवन को प्रभावित करता है । इसीलिए संदेहवादियों का समाधान करने में अनमोल साधनों का व्यय करने की अपेक्षा, हम जिज्ञासुआें और मुमुक्षुआें पर अपना समय एवं ध्यान केंद्रित करना चाहते हैं ।

.  हमारे विषय में वीडियो  जाग्रत जीवन जीएं (Live an Aware Life)

[वीडियोंमें संगीत स्टीवन बर्गेसक(www.aquadio.com) और अन्योंके सौजन्यसे है ।]

.  हमारे प्रेरणास्रोत कौन हैं एवं यह सब कैसे आरंभ हुआ ?

https://www.spiritualresearchfoundation.org/aboutus/images/HH-Dr-Athavale2.gif

प.पू. डॉ जयंत बाळाजी आठवले जी

 

 

 

एस.एस.आर.एफ की स्थापना प.पू. डॉ जयंत बाळाजी आठवले जी के आशीर्वाद से हुई । प.पू. डॉ जयंत बाळाजी आठवले सम्मोहनोपचार विशेषज्ञ भी हैं । उन्होंने भारत और विदेशमें सम्मोहन पर व्यापक मनोविज्ञान शोध किया । वे सन 1971 से 1978 तक ब्रिटेन में रहे । अपने चिकित्साकाल में उनके ध्यानमें आया कि उनका उपचार-अनुपात (रोगियोंका रोग-मुक्ति अनुपात) ७० प्रतिशत है जो अपनेआप में श्रेष्ठतम है । परंतु ३० प्रतिशत रोगी पूर्ण रूपसे ठीक नहीं होते थे । कुछ समय उपरांत उन्होंने देखा कि जो लोग उनकी चिकित्सा से पूर्ण ठीक नहीं हुए, वे किसी पवित्र स्थान पर जाकर, संतों के सान्निध्य में रहकर अथवा कोई आध्यात्मिक उपाय (उदाहरणार्थ कोई धार्मिक विधि, नामजप, तीर्थक्षेत्र में निवास) करने से ठीक हो गए ।

वैसे तो उस समय प.पू. डॉ जयंत बाळाजी आठवले जी नास्तिक थे; परंतु इस घटना से उनमें रोगों के समाधान का कारण समझने की जिज्ञासा उत्पन्न हुई और वे उस दिशा में पहल करने लगे । वे समस्त भारतवर्ष में विभिन्न पंथ के संतों से मिले । उन्होंने सभी संतों से अध्यात्म के विषय में सैद्धांतिक एवं प्रायोगिक प्रश्न किए और सभी उत्तर ध्यानपूर्वक लिखकर रखे । धीरे धीरे उन्हें यह समझ आने लगा कि शरीर और मनोविज्ञान की तुलना में अध्यात्म शास्त्र अधिक श्रेष्ठ है । चिकित्सकीय शास्त्र का संबंध केवल शारीरिक अंग और कुछ सीमातक मनोवैज्ञानिक अंगतक ही मर्यादित है; परंतु इसमें आध्यात्मिक स्तर पूर्णत उपेक्षित रह जाता है । संतों ने उन्हें बताया कि अध्यात्म कोई ऐसा विज्ञान (शास्त्र) नहीं है जो केवल पुस्तकें पढने से सीखा जा सके, यह आचरण में लानेका शास्त्र है । प.पू. डॉ आठवले जी अपने रोगियों के उपचार के लिए यह शास्त्र सीखने हेतु कुछ भी करने के लिए तैयार थे । इसलिए संतों ने उन्हें जो उपदेश दिए, उनका उन्होंने अक्षरश: पालन किया अर्थात उन्होंने संतों के मार्गदर्शन में साधना आरंभ की । परिणामस्वरूप उन्हें गुरुप्राप्ति हुई और उनके जीवन में प.पू. भक्तराज महाराज जी आए ।

His Holiness Bhaktaraj Maharaj

प.पू. डॉ जयंत बाळाजी आठवले जी ने स्वयं को प्राप्त जानकारी सभी तक पहुंचाने के लिए अध्यात्मशास्त्र पर प्रवचन करना आरंभ किया । वे विषय को सरल, वैज्ञानिक तथा व्यवहारमूलक पद्धति से प्रस्तुत करते थे । इससे लोग जीवन में अध्यात्मशास्त्र का आचरण करने लगे और उन्हें उसका तुरंत लाभ होने लगा । प.पू. डॉ जयंत बाळाजी आठवले जी ने जो भी आध्यात्मिक पद्धतियां सीखीं, उनका उपयोग जब उन्होंने अपने रोगियों पर किया, तो उन्होंने देखा कि रोगियों के ठीक होने का अनुपात बढ गया । उन्हें यह भी बोध हुआ कि अध्यात्मशास्त्र मात्र उनके रोगियों की सहायता तक ही सीमित नहीं; अपितु संपूर्ण मानवजाति के लिए लाभकारी है । इसका कारण यह है कि केवल रोगों का ही मूलभूत कारण आध्यात्मिक नहीं है; अपितु जीवन के सर्व प्रमुख प्रसंगों और अधिकतर समस्याआें का भी वही मूल है ।

सन 1985 के उपरांत से प.पू. डॉ आठवले जी अध्यात्म के क्षेत्र में निरंतर प्रयासरत हैं । उन्होंने आध्यात्मिक विश्व को समझने के लिए वैज्ञानिक पद्धति से जो शोधकार्य किया, उसे उन्होंने संपूर्ण मानवजाति तक पहुंचाया । उनके अनेक वर्षों के वैज्ञानिक निष्कर्ष हम उन्हीं के आशीर्वाद से सर्वसुलभ सरल भाषा में प्रस्तुत कर रहे हैं । इस शास्त्र के सिद्धांतों को समझाने के लिए हमने कई चित्रों, रेखाचित्रों (ग्राफ) एवं सारिणीयों का (टेबल्स) भरपूर उपयोग किया है ।

ईश्वरप्राप्ति के इच्छुक विविध पंथों के अनेक साधक अपनी स्वेच्छा से यह जालस्थल (वेबसाइट) विकसित कर रहे हैं । इस प्रयास में प.पू, आठवले जी ने उनका मार्गदर्शन किया है । परिणामस्वरूप साधकों ने अध्यात्मशास्त्र की, साधना की स्वयं अनुभूति ली है ।

 

प.पू. भक्तराज महाराज जी