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१. प्रस्तावना

बचपन से ही मुझे र्इश्वर के अस्तित्व पर विश्‍वास था; परंतु मेरा यह मानना था कि वे कभी विशिष्ट रूप धारण नहीं करते । मेरे परिवार की पृष्ठभूमि चीन से संबंधित है । हम लोग बौद्ध धर्म की परंपराओं तथा आस्थाओं का पालन करते हैं;  परंतु कठोरता से नहीं । १० वर्ष की आयु से मैं प्रायः रात में सोने से पहले र्इश्वर से बात करने का प्रयास करती थी । मेरे परिवार का ध्यान रखने के लिए मैं उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करती और भविष्य में भी ध्यान देने के लिए प्रार्थना करती । उन दिनों किसी भी प्रकार की समस्या आने पर अथवा किसी गंभीर दुर्घटना के समय, मैं र्इश्वर का स्मरण करती थी ।

२. अभिभावकों की वैवाहिक समस्याएं

मेरे बचपन से ही मेरे अभिभावकों में वैवाहिक समस्याएं उत्पन्न होने लगी । उनके विवाद प्रायः हमारे सामने ही होते । मेरी दो बहनें थीं; पर मेरी मां हम तीनों बहनों में से केवल मुझे ही पिताजी के साथ हुए प्रसंग तथा विवाद के संदर्भ में विश्‍वासपूर्वक बताती । उसकी बातोंे से मैं विचलित हो जाती और मुझे पिताजी पर क्रोध आता । इस स्थिति में मैं अवसाद से घिर जाती; क्योंकि इसे सुलझाने के लिए मैं कुछ नहीं कर सकती थी ।

मेरी प्राथमिक शिक्षा के दिनों में घरेलू समस्याएं सुलझाने के लिए मैं विद्यालय के परामर्शदाता (counseller)से बार-बार मिलती । मैं अपने शिक्षकों से भावनात्मक रूप से जुड चुकी थी; क्योंकि वे मुझे और मेरी समस्याओं को समझ पाते थे, जो मेरे साथी नहीं समझ पाते थे । विद्यालय में ऐसी सहायता मिलने पर भी मेरी आंतरिक समस्याएं नहीं सुलझ सकी ।

३. किशोरावस्था के दिन

मैं जब लगभग १५-१६ वर्ष की थी, मुझे प्रतीत हुआ कि मेरे अंदर कुछ परिवर्तन होने लगे हैं । पारिवारिक समस्या के कारण मैं जिस अवसाद में थी, वह अब अभिभावकों के प्रति क्रोध में परिवर्तित हो चुका था । पिताजी के दोहरे जीवन के कारण मुझे उनपर क्रोध आता और इस स्थिति में परिवर्तन लाने के लिए विवाहविच्छेद (divorce) जैसे उपाय न करने के कारण मां पर क्रोध आता । पिताजी के कारण मां सदैव दुखी रहती और अपना क्रोध मुझ पर और मेरी बहनों पर उतारती थी।

2-HIN-Radha-2008लगभग इसी समय से मैंने काले वस्त्र पहनना तथा काला नेल पॉलीश लगाना आरंभ किया । अपने लंबे केश काटकर उन्हें छोटा कराने का निर्णय मैंने पहली बार लिया और उन्हें हरे नीले से लेकर जामुनी तक विविध रंगों से रंग दिया । उस समय मैं Slipknot and Godsmack जैसे अश्‍लील गीतोंवाला heavy metal music  भी बहुत सुनती थी और प्रायः अपनी भाषा में अपशब्द (गालियां) बोलती । डरावने चलचित्र (horror movies) देखने में मुझे आनंद आता था वे जितनी अधिक भयानक होती, उतनी ही उन्हें देखने की मेरी इच्छा तीव्र होती । मेरे मन में भौंए, होंठ आदि छिदवाने एवं शरीर पर गोदना (tattoo) गुदवाने के विचार आते ।

कभी-कभी मुझे अकारण ही भयंकर क्रोध आता और जोर-जोर से चीखने तथा दीवार पर घूंसे मारने का मन करता । उन दिनों मैं शीघ्र ही बहुत भावुक हो जाती थी । उस समय मेरे मित्र और परिवार असमंजस में पड जाते क्योंकि मेरे व्यक्तित्व का नया पहलू अचानक ही उभर आता ।

इसी काल में मुझे अपने यौन-इच्छा के प्रति संदेह होने लगा । कभी कभी मैं एक पुरुष के समान आचरण करने लगती और मुझे पुरुषों के प्रति नगण्य अथवा कोई भी आकर्षण नहीं लगता । मुझे अपनी घनिष्ठ सहेलियों के प्रति थोडा आकर्षण लगने लगा; परंतु इन विचारों तथा भावनाओं को व्यक्त करने में बहुत भय लगता । कभी-कभी मुझे स्त्रियों के प्रति यौन विचार आते थे और ये इतने तीव्र होते थे कि मुझे लगता जैसे मेरे साथ कुछ गलत हो रहा है । मुझे लगता कि ये मेरे समलैंगिक होने का लक्षण है जबकि मेरे किसी स्त्री के साथ शारीरिक सबंध नहीं थे ।

एक व्यक्ति के रूप में मैं कौन हूं और क्या हूं, यह समझने तथा खोज निकालने के लिए मुझे बहुत संघर्ष करना पडा । अपनी विविध इच्छाओं के अनुसार आचरण करने में मैं विचलित हो जाती थी । इससे मैं भीतर से सदैव अशांत रहती । आगे मैं यह समझ पाई कि वास्तव में हम कौन हैं, यह जानने में केवल अध्यात्म ही हमारी सहायता कर सकता है ।

४. अध्यात्म में रूचि उत्पन्न होना

वर्ष २००८ में विश्वविद्यालय में जाने के पश्‍चात मैं अध्यात्म में बहुत रूचि लेने लगी । मैंने मानववंशशास्त्र (Anthropology) के विषय में शिक्षा लेना आरंभ किया । विश्व की विविध श्रद्धाओं तथा विविध सभ्यताओं के धर्म एवं आध्यात्मिक आयामसंबंधी उनके ज्ञान के संदर्भ में जानने की मेरी बहुत जिज्ञासा रहती ।

इसी  समय मैं एक मनोरंजन के साधनों की दुकान में काम करने लगी । वहां दो व्यक्तियों के साथ मेरी मित्रता हुई (जो आगे SSRF के साधक बन गए)। हम प्रायः अध्यात्म पर चर्चा करते; इसलिए मैं उनसे तत्काल जुडाव अनुभव करने लगी । काम के पश्‍चात अथवा साप्ताहिक छुट्टी में अध्यात्म पर चर्चा करने के लिए मैं प्रायः उनके घर जाती और वे मुझे अपने पास के अध्यात्म तथा आध्यात्मिक उपचार संबंधी ग्रंथ दिखाते थे ।

५. SSRF के साथ साधना का आरंभ

वर्ष २००९ में मेरे कार्यालय के दो मित्रों ने भारत के गोवा जाने की योजना बनाई और उस कालावधि में उनके घर की निगरानी करने के लिए मुझे कह गए । भारत पहुंचने पर वे अचानक ही SSRF के शोधकेंद्र में पहुंचे और वहीं रहकर उन्होंने साधना आरंभ की ।

जब वे भारत में थे, उन कुछ माह में, मेरे परिवार में हमें अनिष्ट शक्तियों संबंधी अनुभव होने लगे । मेरी चाची, छोटी बहन और मैं उस अनिष्ट शक्ति का अस्तित्व अनुभव करते । वह शक्ति घर में हमे डराने के लिए कुछ न कुछ करती रहती थी ।

मैं समझ नहीं पा रही थी कि क्या करना है इसलिए मैंने SSRF के शोधकेंद्र में रहनेवाले अपने दो मित्रों को हमारे साथ हो रही घटनाओं का विवरण देने हेतु संगणकीय पत्र (email) भेजा; क्योंकि यही लोग मुझे समझ सकते थे और कुछ मार्गदर्शन कर सकते थे । उन्होंने SSRF के जालस्थल की लिंक मुझे प्रेषित की और श्री गुरुदेव दत्त का नामजप आरंभ करने के लिए कहा । पहली बार ही जालस्थल पढने पर मुझे ऐसा प्रतीत हुआ कि मैं जो कुछ भी पढ रही हूं, वह शत-प्रतिशत सत्य ही है और उन लेखों में लिखे सूत्रों के बारे में मुझे कभी कोई शंका नहीं हुई ।

जब पहले दिन मैंने भगवान दत्तात्रेय का नामजप आरंभ किया, उसी रात मुझे निद्रा पक्षाघात (स्लीप पैरालिसिस) का अनुभव हुआ तथा अपने पूरे शरीर पर स्पष्ट वेदनादायी दबाव अनुभव किया । बचपन से अनेक बार मैंने निद्रा पक्षाघात अनुभव किया था; परंतु यह अनुभव सर्वाधिक भयंकर था । अपनेआप मेरे मन में भगवान दत्तात्रेय का नामजप आरंभ हुआ और कुछ समय पश्‍चात निद्रा पक्षाघात और दबाव समाप्त हुआ । मैंने भगवान दत्तात्रेय का नामजप प्रतिदिन करना आरंभ किया और यह अनुभव किया कि जब भी मैं यह नामजप करती, अनिष्ट शक्ति मेरे पास नहीं आती, मुझसे दूर रहती । इससे मेरी श्रद्धा दृढ हुई कि यह नामजप मुझे सुरक्षा प्रदान कर रहा है और मैंने अपने परिवार को यह नामजप करने के लिए प्रेरित किया ।

SSRF के साधक मुझे नामजप संबंधी अथवा आध्यात्मिक उपचारों सबंधी जो भी बताते, मैं वह लगनपूर्वक करने का प्रयास करती । इससे मेरी मानसिक स्थिति में और कुल स्वास्थ्य में सकारात्मक परिवर्तन दिखाई देने लगे । जिन प्रसंगों में मुझे अनेक निरर्थक और नकारात्मक विचार आते थे, उन प्रसंगों में मैं शांत रहने लगी ।

शीघ्र ही मेरे मित्र भारत से लौटे और उन्होंने SSRF के शोधकेंद्र में जो सीखा और साधना की, उस संदर्भ में मुझे बताया । मैं उनके घर बार-बार सत्संग के लिए जाती थी । प्रत्येक बार सकारात्मकता का अनुभव होने के कारण मुझे उनके घर सत्संग के लिए जाने की बहुत उत्कंठा रहती थी । साथ ही प्रत्येक बार साधना की दृष्टि से कुछ नया सीखने की मुझे जिज्ञासा रहती थी ।

मैंने उत्तरी अमरीका के दूरभाष पर होनेवाले साप्ताहिक सत्संगों में उपस्थित रहना भी आरंभ किया । मुझे कई अनुभूतियां होती थी । उदा.-मेरे मन में आनेवाली शंकाओं का समाधान अपनेआप सत्संग का संचालन करनेवाले साधकद्वारा होना अथवा किसी अन्य साधकद्वारा वही प्रश्‍न पूछा जाना और मुझे मेरे प्रश्‍नों का उत्तर मिलना इ.। सत्संग में मिलनेवाले चैतन्य से पूरे सप्ताह मेरी साधना के प्रयत्नों में सहायता होती थी । इसलिए प्रत्येक शुक्रवार की रात में मैं सत्संग में अपना स्थान निश्‍चित करती और मित्रों के साथ बाहर जाना टालती थी ।

शीघ्र ही हमें उसी शहर में रहनेवाला चौथा साधक मिला, जिसने SSRF के मार्गदर्शन में साधना आरंभ की । हम सभी ने मिलकर सत्सेवा के रूप में लोगों के लिए SSRF द्वारा कार्यशालाओं की शृंखला आरंभ की ।

६. आध्यात्मिक कष्ट का सामना करना एवं उन पर विजय प्राप्त करना सीखना

साधना आरंभ करने के कुछ समय पश्‍चात मार्गदर्शन करनेवाले साधक ने बताया कि मुझे अनिष्ट शक्तियों के तीव्र कष्ट हैं । विद्यालय जाने से पहले सवेरे उन्होंने मुझे यह बताया । मुझे याद है कि उस समय कक्षा में बैठते समय मुझे बोध हुआ कि तीव्र कष्ट से पीडित होना अर्थात अनिष्ट शक्ति से आविष्ट होना । यह स्वीकार करने में मुझे कुछ समय लगा; परंतु एक बार स्वीकार करने पर मैं उसका अर्थ तथा कष्ट पर विजय प्राप्त करने के लिए मुझे क्या करना होगा, यह समझने का प्रयास कर सकी ।

अब मैं यह समझने लगी कि मुझे आविष्ट करनेवाली अनिष्ट शक्ति के कारण मुझमें विशिष्ट स्वभाव था और मैं स्वयं में दो भिन्न व्यक्ति अनुभव करती थी । फलस्वरूप मेरे किशोरावस्था के दिन अब अर्थपूर्ण होने लगे । मुझे यह भी अनुभव हुआ कि मैं किसी पुरुष अनिष्ट शक्ति से आविष्ट थी, जिसके कारण मुझे महिलाओं के प्रति आकर्षण लगता था ।

जैसे ही मैंने साधना एवं आध्यात्मिक उपचार बढाना आरंभ किया, मुझे आविष्ट करनेवाली अनिष्ट शक्ति शारीरिक गतिविधियों और मुख के हावभावों के साथ प्रकट होने लगी । सत्संग अथवा सात्त्विक वातावरण में जाने पर प्रायः ऐसा होता था । र्इश्वर की कृपासे यह साधकों के साथ रहने पर ही होता था । मेरे परिजन एवं मित्र यदि यह देखते तो कदाचित डर जाते ।

यह कष्ट कभी-कभी नकारात्मक विचार एवं अपनेआपको हानि पहुंचाने के विचारोंद्वारा प्रकट होता था । उदा. वाहन चलाते समय कई बार मुझे इच्छा होती थी कि सामनेवाले वाहन को टक्कर मारूं अथवा कभी-कभी वैसा दृश्य मेरी आंखों के सामने आता था । इन दिनों मैं र्इश्वर से सहायता के लिए तथा ऐसे विचारों एवं इच्छाओं पर कैसे विजय प्राप्त करुं यह सिखाने के लिए प्रार्थना करती थी । ये विचार तथा इच्छाएं तीव्र होने पर भी र्इश्वर की कृपा से मेरे साथ कुछ अनिष्ट नहीं हुआ ।

वर्ष २०१० जनवरी में SSRF ने अपने शोधकेंद्र में होनेवाली कार्यशाला का प्रसारण विश्व के कुछ साधकों के लिए अंतरजाल पर किया । मुझे याद है कि जब मैं कार्यशाला का कोई भी सत्र देखने का प्रयास करती, मेरा कष्ट इतना बढ जाता कि उसका वर्णन करना मेरे लिए संभव नहीं है । उस सप्ताह मेरे पेट में पूरे दिन लगातार मरोड उठती थी । मुझे वाहन चलाकर विद्यालय में उपस्थित रहना पडता था । मुझे भय भी था कि मेरी इन अनियंत्रित गतिविधियों को देखकर लोग क्या सोचेंगे । केवल र्इश्वरकृपा से ही जब मैं कक्षा में अथवा परिजनों के साथ रहती, तो मेरे शरीर की ये अनियंत्रित तीव्र गतिविधियां सौम्य हो जाती; तथापि मेरे एकांत में रहने पर वे पुनः तीव्र हो जाती । जब आवश्यकता पडने पर गतिविधियां सौम्य हो जाती, तब यह देखकर मुझे लगा कि र्इश्वर ही कुछ कर रहे हैं, जो मेरी बुद्धि के परे है और मैंने यह स्वीकार किया ।

इन अनुभवों से मैंने समझा कि तीव्र कष्ट के वेश में यह मेरे लिए आर्शीवाद जैसा ही है; क्योंकि इन कष्टों के माध्यम से र्इश्वर मुझे क्षात्रवृत्ति और आध्यात्मिक उपायों के प्रति गंभीरता सिखा रहे हैं । साथ ही वे आत्मनिर्भरता बढाना, परिस्थिति को स्वीकार करना और सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण, यह श्रद्धा रखना सिखा रहे हैं कि र्इश्वर सदैव मेरी रक्षा कर रहे हैं ।

७. SSRF के शोधकेंद्र में आना

जुलार्इ २०११ में मैं पहली बार SSRF के शोधकेंद्र में कार्यशाला के लिए आई । इस कार्यशाला के उपरांत मैंने विद्यालय में जाना बंद करने का और पूर्णकालीन साधना करने का निर्णय लिया । मैंने अपनी शिक्षा बोर्ड की परीक्षातक पूरी की थी, जिससे मैं उस क्षेत्र में नौकरी के लिए आवेदन करने की पात्र थी । परंतु पहले से ही मैंने उच्च पदवी प्राप्त करने का निश्‍चय किया था । मैंने समझ लिया कि विद्यालय जाने, गृहपाठ करने, प्रकल्प पूर्ण करने आदि में बहुत समय व्यर्थ होता है और प्रत्यक्ष जीवन में मेरी इस सांसारिक प्रतिष्ठा और पदवी का साधना की तुलना में कोई महत्त्व नहीं था । आपातकाल के पहले साधना के लिए हमारे पास अत्यल्प समय शेष है ।

र्इश्वरकृपा से २०११-२०१४ के बीच SSRF के शोधकेंद्र में आकर साधना करने के मुझे अनेक अवसर मिले ।

SSRF के शोधकेंद्र में मैंने घर जैसी शांति अनुभव की । वहां रहनेवाले सहसाधकों से मैंने बहुत कुछ सीखा । उनसे मुझे मेरी साधना और आध्यात्मिक प्रगति के लिए बहुत मार्गदर्शन मिला । मैंने साधना के ८ अंग कृति में लाने के लिए प्रयत्न किए । स्वभावदोष निर्मूलन प्रक्रिया पर ध्यान केंद्रित किया । संतों के साथ लगातार रहने से आध्यात्मिक जीवन जीने के महत्त्व एवं साधना करने के प्रति मेरा निश्‍चय दृढ हुआ ।

SSRF के शोधकेंद्र में पहली कुछ भेंट में मुझे आविष्ट करनेवाली अनिष्ट शक्ति प्रायः तीव्रता से प्रकट हो जाती थी । मैं विविध प्रकार के सूक्ष्म प्रयोगों में सम्मिलित हुई, जिनमें अनिष्ट शक्ति प्रकट होकर अमानवीय विकृत हाव-भाव करती थी । इन प्रयोगों से मुझे अनिष्ट शक्तियों के विषय में तथा स्वयं में एवं अनिष्ट शक्ति में अंतर करने के संदर्भ में अधिक सीखने को मिला । इन प्रकटीकरणों को शांत करने का एक ही मार्ग है -भावजागृति, र्इश्वर का नामजप और आर्तता से प्रार्थना करना । इन अनुभवों से मेरी यह श्रद्धा दृढ हुई कि केवल र्इश्वर ही मुझे अनिष्ट शक्तियों एवं कष्टों से बचा सकते हैं और इसीलिए ये प्रयोग किए गए । अन्य कारण यह है कि सूक्ष्म प्रयोगों द्वारा अनिष्ट शक्ति को बलपूर्वक प्रकट होने को प्रवृत्त किया जाता है, जिससे उन्हें अपनी काली शक्ति को खोना पडता है, जो साधक के लिए सहायक होती है और इससे साधक के कष्ट न्यून हो जाते हैं ।

८. ६१%आध्यात्मिक स्तर प्राप्त करना

मार्च २०१३ में जब मैं SSRF के शोधकेंद्र में रह रही थी, उस समय घोषित किया गया कि मैंने ६१% आध्यात्मिक स्तर प्राप्त किया है । आध्यात्मिक कष्ट होते हुए भी केवल र्इश्वरकृपा से ही मैं यह प्रगति कर पाई, इसलिए र्इश्वर के प्रति अत्यंत कृतज्ञता लगी । प्रत्येक परिस्थिति एवं अनुभव को साधना के रूप में स्वीकार करने से र्इश्वर ने यह दिखा दिया कि जब हम एक पग र्इश्वर की ओर बढते हैं, र्इश्वर दस पग हमारी ओर बढते हैं । SSRF के सभी साधकों के माध्यम से र्इश्वर ने मुझे साधना के ८ अंगों को कृति में लाने हेतु और मेरे स्वभावदोष तथा अहं पर मात करने के लिए स्वभावदोष निर्मूलन प्रक्रिया द्वारा कैसे प्रयत्न करें यह समझने में मार्गदर्शन एवं सहायता की, इसलिए मुझे अत्यंत कृतज्ञता लगी ।

९. वर्तमान स्थिति

SSRF के संपर्क में आकर यदि मैं साधना नहीं करती, तो पता नहीं आज मैं किस स्थिति में होती । केवल साधना के कारण ही मैं जीवन के वास्तविक उद्देश्य को समझ सकी और समस्याओं का सामना कर सकी । मैं कौन हूं, इस संदर्भ में मेरे मन में कोई संदेह नहीं है; क्योंकि साधना ने मुझे समझाया है कि वास्तविक रूप में हम सभी आत्मस्वरूप हैं । मैंने SSRF के एक पुरुष साधक से आनंदपूर्वक विवाह किया है और कृतज्ञ हूं कि हम दोनों एक-दूसरे की साधना में सहायता कर रहे हैं ।

मेरा आध्यात्मिक कष्ट बहुत अल्प हुआ है और मैं साधना एवं सेवा के लिए अधिक समय दे पा रही हूं । जो कष्ट जन्म-जन्मांतरतक मेरे साथ रहते, ऐसे कष्ट पर विजय प्राप्त करने में मेरी सहायता के लिए र्इश्वर एवं SSRF की मैं अत्यंत ऋणी हूं । साधना करने से अंतर में प्रतीत होनेवाली शांति एवं स्थिरता जिसके लिए समाज के अधिकतर लोग संघर्ष कर रहे हैं, मैं उसका अनुभव कर रही हूं ।

SSRF के पाठकों से मेरी आर्तता से विनती है कि वे आज ही साधना आरंभ करें; क्योंकि इस विश्व में साधना के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है, जो आप को शांति एवं आप के खरे स्वरूप का ज्ञान करवा दें । साधनामार्ग में कितने भी उतार-चढाव आए, श्रद्धा के साथ साधना करते रहें; क्योंकि र्इश्वरप्राप्ति का अंतिम ध्येय अमूल्य है, जो इस मार्ग में किए प्रत्येक प्रयत्न की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है ।

– सौ.क्रिस्टी ल्यूंग, वैंकूवर, कनाडा.