दैनिक कृत्य जैसे कार्यालय में काम करते समय अथवा वार्तालाप करते समय नामजप करना कैसे संभव है ?

जब हम नामजप करना आरंभ करते हैं, हमें ऐसा प्रतीत होता है जैसे ईश्वर का नामजप करने हेतु एकाग्रता करने में हमें वास्तव में संघर्ष करना पडता है । अनेक बार प्रारंभिक अवस्था में, हमें अपने कार्यों को रोक कर एवं प्रयत्नपूर्वक माला (मणियों की माला) लेकर नामजप करना पडता है । ऐसी स्थिति में, यदि कोई हमें बताए कि वार्तालाप सहित अन्य सभी दैनिक कृत्य करते समय भी, नामजप करना संभव है, तो यह बात कल्पना से भी परे प्रतीत होगी । नामजप के समय हमारी एकाग्रता एक ही दिशा में कार्यरत लगती है । इसलिए हमें निर्णय करना पडता है कि नामजप करें अथवा अन्य सांसारिक कार्य ।

परंतु वास्तविकता तो यह है कि जब हमारी आध्यात्मिक उन्नति होती है, तब हमारा नामजप भी अधिक सूक्ष्म तथा अधिक गुणात्मक हो जाता है । अधिक सूक्ष्म से हमारा तात्पर्य है कि यह हमारी चेतना की गहरार्इ में होता रहता है । नामजप के अभ्यास की उच्च अवस्था में, हम शारीरिक एवं मानसिक गतिविधि के समय भी नामजप कर सकते हैं । आर्इए देखें यह कैसे संभव होता है ।

हममें से प्रत्येक व्यक्ति एक ही समय पर अपना ध्यान ८ कार्यों पर केंद्रित कर सकता है । यह एकाग्रता पंचज्ञानेंद्रियों ( कान, त्वचा, नेत्र, जीभ तथा नासिका जिन्हें बाह्य ज्ञानेंद्रियां कहा जाता है), सचेत मन (बाह्यमन), अवचेतन मन (चित्त) तथा बुद्धि ( ये तीनों आंतरिक ज्ञानेंद्रियां हैं ) इन आठों के द्वारा होती है । अंग अपना निश्चित कार्य करते हैं । हमारे दैनिक जीवन में, हम इन आठों के माध्यम से एक साथ अनेक प्रकार के जटिल कार्य करते हैं । कल्पना करें कि एक व्यक्ति सडक पार कर रहा है । सडक पार करते समय वह एक साथ यातायात की बत्तियों के प्रति सतर्क रहता है, किसी भी वाहन की ध्वनि सुन लेता है, वातावरण की गंध लेता है, मौसम के ठंडे अथवा गर्म होने का अनुभव करता है, मित्र अथवा सहकर्मी के संग वार्तालाप में मग्न रहता है, इत्यादि । इसके अतिरिक्त वह अन्य विषय पर भी चिंतन करता है तथा निर्णय भी लेता है जैसे कितनी गति से पैदल चलना है, किस दिशा में जाना है, क्या वह समय पर पहुंच पाएगा । इस प्रकार, प्रत्येक व्यक्ति के अवचेतन मन में ८ विषयों के प्रति सतर्क रहने की क्षमता होती है, जिसे अष्टावधान कहा जाता है ।

जब हम नामजप करना आरंभ करते हैं, तब यह केवल सचेत मन (बाह्यमन) तक सीमित होता है । इस चरण में, हमें नामजप करते समय अनेक कार्य कर पाना असाध्य प्रतीत होता है । जब हम नामजप का अभ्यास बढाते हैं, तब हमारे अवचेतन मन में नामजप का एक नया संस्कार बनता है । यह संस्कार भक्तिकेंद्र नामक केंद्र में विकसित होता है । जैसे ही यह भक्तिकेंद्र हमारे अवचेतन मन में विकसित होता है, यह नामजप संबंधी विचार प्रक्षेपित करने लगता है ।

देखें संदर्भ लेख – नामजप अथवा भक्तिकेंद्र कैसे बनता है ।

जब भक्तिकेंद्र अवचेतन मन को ५०% से अधिक ढंक लेता है, ईश्वर का नामजप उस समय अवचेतन स्तर पर होने लगता है । सामान्यतया यह ५०% आध्यात्मिक स्तर पर संभव होता है ।

जैसा कि हमने देखा कि एकाग्रता अष्टावधान हो सकती है; इसलिए हम हमारे पंचज्ञानेद्रियों द्वारा अनेक कार्य कर सकते हैं और साथ ही अवचेतन मन नामजप करता रहता है । हमारा मुख एवं बुद्धि वार्तालाप में व्यस्त हो, तब भी हमारा अवचेतन मन नामजप कर रहा होता है, जो प्रत्यक्ष रूप से सामनेवाले व्यक्ति को नहीं दिखता । इस स्तर पर नामजप कर रहे व्यक्ति को ईश्वर का स्मरण उसके द्वारा किए जा रहे प्रत्येक कार्य में होता है।

इस स्तर का नामजप तब संभव हो सकता है, यदि हम प्रतिदिन कुछ समय के लिए नामजप करें । इस स्तरतक हम अल्प काल में किस प्रकार पहुंच सकते हैं, यह निम्न सूत्रों पर निर्भर करता है :

  1. आध्यात्मिक उन्नति करने की हमारी इच्छा
  2. नामजप की संख्या एवं गुणात्मकता तथा
  3. नामजप के साथ साधना के अन्य चरणों का भी अभ्यास किया जा रहा है अथवा नहीं, जैसे :
    • साधकों के संग में रहना (सत्संग) अथवा
    • ईश्वर की कोई सेवा करना, जैसे अध्यात्मप्रसार के लिए कार्य करना (सत्सेवा)