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१. संक्षिप्त जीवनी

पू. योया वेजिलीच का जन्म अप्रैल १९५३ में हुआ  । वे अर्थशास्त्र में स्नातक हैं तथा अपने कार्यकाल के अधिकांश समय में उन्होंने व्यवसायी सम्मेलनों का आयोजन किया । वर्ष १९९१ तथा १९९९ के मध्य, वे मलेशिया तथा सिंगापुर में रहीं तथा वहीं काम किया  । वहां अपने निवास के समय, उन्हें विभिन्न संस्कृतियों के लोगों से मिलने का तथा विविध प्रकार के साधना मार्गों तथा साधना के संबंध में सीखने का अवसर प्राप्त हुआ । उस समय तक आध्यात्मिक उपचार की पद्धतियों की ओर उनका झुकाव हो गया था तथा वे उनमें से कुछ उपचारों का अभ्यास भी करती थीं  ।

दूसरों की प्रसन्नता हेतु उनकी सहायता करने तथा उनकी चिंताओं को दूर करने की अत्यधिक तडप तथा इच्छा उनमें उनके बाल्यावस्था से ही थी  । जीवन की अनेक परिस्थितियों में वे अपने परिवार तथा मित्रों को इसी उद्देश्य से सहायता करने का प्रयास करतीं  । उनकी अपनी निजी समस्या होने पर भी वे उस समय उसे अलग रखने में सक्षम थीं और दूसरों की परिस्थितियों तथा समस्याओं की ओर पूरा ध्यान देती थीं  ।

वर्ष २००० से उन्होंने SSRF के मार्गदर्शनानुसार साधना करना प्रारंभ किया ।

वर्ष २००६ में उनका आध्यात्मिक स्तर ५० प्रतिशत था । इसके उपरांत दो वर्षों में ही उनका आध्यत्मिक स्तर बढकर ६० प्रतिशत हो गया ।

2-Hindi_progress-p-lolaजनवरी २०१२ में वे संतपद (७० प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर) पर आरूढ हुर्इं । इस लेख के प्रकाशन (सितंबर २०१४) के समय उनका आध्यात्मिक स्तर ७५ प्रतिशत था ।

3-Hindi_p-lola-sainthood२. प्रमुख आध्यात्मिक विशेषताएं

पू. लोला वेजिलीच की कुछ प्रमुख आध्यात्मिक विशेषताएं हैं :

१. ईश्वरीय तत्त्व से सतत एकरूप रहना

२. परम पूजनीय भक्तराज महाराज के प्रति अनन्य भाव

३. वे निरंतर आनंद में रहती हैं तथा आनंद प्रदान भी करती हैं ।

४. सभी के प्रति निरपेक्ष प्रेम

५. स्वयं को भूलकर दूसरों का विचार करना

३. उनकी आध्यात्मिक उन्नति कैसे हुई ?

हमने पू. लोला वेजिलीचजी से उनकी आध्यात्मिक यात्रा के विषय में जानने के लिए तथा उन्होंने शीघ्र आध्यात्मिक प्रगति के लिए क्या प्रयास किए यह समझने के लिए उनसे बात की ।

३.१ नामजप

हमने पू. लोला वेजिलीचजी (७५ प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर) से नामजप से संबंधित उनके अनुभव बताने का अनुरोध किया ।

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पूजनीय लोला : “मुझे नामजप करना बहुत अच्छा लगता था । नामजप का लाभ समझने के कारण इसके प्रति शीघ्रता से रुचि विकसित हो गई । इससे यह लाभ हुआ कि मेरा मन अधिक शांत रहने लगा तथा मुझे अधिक स्पष्टता प्राप्त हुई । दिन में मुझे कुछ घंटे बैठ कर नामजप करना बहुत अच्छा लगता था । समय के साथ मुझे नामजप से आनंद अनुभव होने लगा । अब तो नामजप के विषय में सोचने मात्र से आनंद मिलता है । मुझे शब्दों का अधिक ज्ञान नहीं है; किंतु नामजप के विषय में सोचने पर जो आनंद उत्पन्न होता है उसे अनुभव कर सकती हूं ।

“जब कभी मैं किसी प्रतिकूल परिस्थिति में होती अथवा मुझे लगता कि साधना ठीक प्रकार से नहीं हो रही है अथवा कोई सांसारिक समस्याएं होती, तब मैंने अनुभव किया कि जब भी मैं कुछ समय के लिए बैठकर नामजप करती तब मेरा मन शांत हो जाता और मैं कुछ नए समाधान ढूंढ निकालने तथा इस प्रकार समस्या को सुलझाने में समर्थ होती । नामजप के साथ कुछ प्रार्थनाएं भी करती जिससे मन शांत हो जाता । इस प्रकार समाधान अधिक स्पष्टता से दिखाई देते और समस्या पर समाधानकारी हो जाते ।

“नामजप से ईश्वर की अनुभूति भी होती । कुछ वर्षों के उपरांत मुझे नामजप से ईश्वर के अस्तित्व की अनुभूति होने लगी । मुझे परम पूज्य भक्तराज महाराज के रूप में उनका अस्तित्व अनुभव होता । नामजप करते समय मुझे उनके अस्तित्व की अनुभूति होती । धीरे धीरे मुझे यह समझ में आने लगा कि मेरे साधना करने का उद्देश्य वास्तव में ईश्वर के अस्तित्व को अनुभव करना था । ईश्वर के अस्तित्व का अनुभव करने पर बहुत सुंदर अनुभूतियां होती हैं । यद्यपि इस अनुभूति को समझाने के लिए केवल सुंदर शब्द पर्याप्त नहीं होंगे, यह स्वयं को भुलाकर तथा ईश्वर के अस्तित्व, विशालता, आनंद, शांति का भान करना तथा और भी बहुत कुछ होते हैं जिन्हें शब्दों में वर्णन नहीं किया जा सकता I”

३.२ सत्संग में रहना

वर्ष २००१ में, पू. लोलाजी ने सत्संग में सम्मिलित होना आरंभ किया । हमने उनसे पूछा कि आपको उसमें सम्मिलित होने के लिए किस बात ने आकर्षित किया ।

पूजनीय लोला : “हमारे प्रथम सत्संग में मात्र SSRF के ग्रंथों को पढना तथा उनसे कुछ समझने का प्रयास करना सम्मिलित था । हमारे मन तथा बुद्धि की सीमित परिधि के कारण बहुत ही अल्प समझ आता । किंतु हम यह जानते थे कि इन शब्दों के पीछे बहुत ही महत्वपूर्ण तथा सुंदर बाते हैं जिन्हें कुछ समय पढने के उपरांत समझने तथा अनुभव कर पाने में हम समर्थ होंगे । इस आशा से हम बढते गए तथा इसी ने सत्संग में रहने की हमारी तडप को बनाए रखा ।

“सत्संग कभी साधकों के साथ होता तो कभी ग्रंथों को पढने के रूप में अथवा कभी संत अथवा गुरु का सत्संग होता जो कि सर्वोच्च सत्संग होता है । उन सत्संगों में किसी न किसी रूप में ईश्वर के अस्तित्व की अनुभूति हो जाती । यह सदैव उत्साह, अत्यधिक हर्ष, साधना की अवधारणाओं तथा सिद्धांतों की कुछ समझ प्रदान करता । वास्तव में, संतों तथा गुरु के सत्संग सर्वोच्च सत्संग होते हैं तथा ये सदैव सर्वोच्च सुख, हर्ष तथा ज्ञान प्रदान करते हैं ।

‘‘सत्संग में जितना अधिक चैतन्य होगा हमें उतना ही अधिक अच्छा अनुभव होगा । मैं समझती हूं कि संतों तथा गुरु के साथ हुआ सत्संग चैतन्य का सर्वोच्च रूप है (सर्वोच्च चैतन्य है) तथा चैतन्य हमें साधना के लिए उत्साह तथा उसे निरंतर बनाए रखने की इच्छा प्रदान करते हैं । ये हमें साधना, आनंद तथा जीवन का आनंद भी प्रदान करते हैं ।’’

३.३ साधकों की साधना पर ध्यान देने की सत्सेवा

संतपद प्राप्त करने से पूर्व पू. लोला साधकों को उनकी व्यष्टि साधना में मार्गदर्शन करती थीं । हमने उनसे इस विषय में बताने के लिए कहा ।

पूजनीय लोला : “मैं अत्यंत भाग्यशाली थी कि मुझ बहुत सुंदर सेवाओं को करने का अवसर प्राप्त हुआ । उनमें से एक थी साधकों तथा उनकी साधना की ओर ध्यान देना । साधकों का ध्यान रखते समय मुझे ऐसा लगता जैसे ईश्वर ने मुझे उनके बच्चों की देखभाल करने का उत्तरदायित्व दिया है तथा एक समय ऐसा लगा कि मेरे बहुत सारे बच्चे हैं और यह अनुभूति बहुत अच्छी होती । वास्तव में मेरी एक ही पुत्री है; किंतु उन सभी साधकों की देखभाल करते हुए मैं बहुत धनवान अनुभव करती और मुझे लगता कि ईश्वर ने मुझे उनके बच्चों का ध्यान रखने का उत्तरदायित्व दिया है ।

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“प्रारंभ में, मैं इसे अपने दायित्व तथा कर्तव्य समझती थी तथा चूंकि यह साधकों के विषय में था इसलिए मैं स्वयं के साथ बहुत कठोर रहती । मुझे लगता कि साधकों को सर्वोत्तम मिलना चाहिए तथा इसलिए उनकी देखभाल अत्यंत प्यार तथा स्नेह से की जानी चाहिए । कुछ समय उपरांत यह अत्यंत स्वाभाविक हो गया तथा मुझे लगता कि ईश्वर स्वयं साधकों की देखभाल कर रहे हैं । अतः इसमें कोई बडी बात नहीं है । यह स्वाभाविक रूप से होता गया । जैसा हम सांसारिक जीवन में अनुभव करते है उस प्रकार का यह प्रेम नहीं है । यह भिन्न प्रकार का प्रेम है । यह अत्यंत गहरा है । र्इश्वर का प्रेम तथा स्नेह जागृत होता गया और स्वाभाविक रूप से वह प्रवाहित होता गया । इसलिए सेवा यह सोचे बिना ही हो जाती थी कि क्या करना चाहिए तथा इसे कैसे करना चाहिए क्योंकि ईश्वर स्वयं यह विचार देते कि क्या करना चाहिए तथा इसे स्वतः ही करवा लेते I”

३.४ उनके घर पर जाने से प्रीति की अनुभूति होना

11-Hindi_p-lola-cookingपू. लोला से मार्गदर्शन लेने हेतु कई साधक नित्य उनके घर जाते हैं । वहां समय व्यतीत करने पर उन सबको विभिन्न अनुभूतियां होतीं । हमने पू. लोला से उन अनुभूतियों का कारण पूछा ।

पूजनीय लोला : “साधकों के साथ अत्यधिक आनंद का अनुभव होता है । कभी किसी कारणवश साधक नहीं आते तो मैं व्याकुल हो जाती । मुझे साधक अपने परिवार के सदस्य से भी निकट लगते । साधकों के प्रति यह निकटता तथा प्रेम भीतर से अनुभव होता और इसे अधिक अच्छी तरह यह कहकर वर्णित किया जा सकता है कि ‘मैं साधकों तथा साधना के लिए ही हूं’ I’’

“ईश्वर ने मुझे दूसरों के प्रति प्रेम का तथा साधकों को सहज, अपने, स्नेहपूर्ण तथा शांतिपूर्ण अनुभव होने हेतु उनके लिए कुछ करने की इच्छा का यह अनमोल उपहार दिया है । दूसरों के लिए क्या किया जा सकता है ये विचार स्वाभाविक ही भीतर से आने लगते और कुछ सामान्य कृत्य हो जाते । उनकी रुचि का भोजन पकाना, साधकों का तथा उनके परिवार के सदस्यों का हालचाल जानना, उनके सुख और दुःख बांटना, समस्या सुनना, साधना तथा जीवन के लिए समाधान बताना, उनके साथ हंसना, आदि होता जो एक मां करती हैं ।’’

“कभी-कभी साधकों के वहां होने से, उनको देखने अथवा उनके विषय में सोचने मात्र से मैं प्रसन्न हो जाती । मैं बच्चों के साथ उनकी सादगी, स्पष्टता तथा ईमानदारी के कारण उनसे निकटता अनुभव करती । कभी-कभी हम साथ खेलते तथा उनकी रुचि से संबंधित बातें करते । दूसरों को सुखी देखने पर मुझे अत्यधिक हर्ष तथा आनंद होता तथा उस समय मैं स्वयं को भूल जाती और ऐसा लगता जैसे कि मैं ‘दूसरों के लिए जी रही हूं’ । ईश्वर ने दूसरों के साथ बांटने के लिए अपना इतना अधिक प्यार मुझे दिया, इसके लिए मैं उनके प्रति अत्यधिक कृतज्ञ हूं I”

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३.५ आध्यात्मिक उपचार

दूसरी सत्सेवा जो पू. लोला करती थीं वह थी साधकों पर आध्यात्मिक उपचार करने की सेवा ।

“मुझे इस सेवा को करने से प्रसन्नता मिलती थी । परम पूजनीय डॉ. आठवलेजी की साधकों के प्रति अनन्य प्रीति के कारण उन्होंने मुझे साधकों पर आध्यात्मिक उपचार करने का अवसर प्रदान किया । इससे पहले कुछ समय से मुझे लगता था कि तीव्र कष्ट से पीडित साधक इतना अधिक कष्ट भोग रहे हैं तथा कितना अच्छा हो यदि कोई उन पर आध्यात्मिक उपचार करके उनका कष्ट न्यून कर सके ।’’

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“यह सत्सेवा करते समय मुझे सदैव ऐसा लगता कि साधकों के कष्ट को न्यून करने में, उनकी बाधाओं को दूर करने में तथा उनके द्वारा कष्ट को सहने और उससे युद्ध करने के लिए उन्हें प्रेरित करने में, उनकी सहायता करने के उद्देश्य से मेरे समय का उपयोग बहुत सार्थक रूप से हो रहा है । मैंने अनुभव किया कि मैं कुछ नहीं कर रही हूं । प.पू. भक्तराज महाराजजी द्वारा प्रेरित प्रार्थना है : ‘इस आध्यात्मिक उपचार में मेरा अस्तित्व नष्ट होने दें तथा आपका ही अस्तित्व रहने दें । आप ही बैठें, श्वास लें, नामजप करें तथा अपने साधकों पर आध्यात्मिक उपचार करें ।’

“आध्यात्मिक उपचार की सेवा से मैंने उससे भी अधिक यह सीखा कि सेवा करते समय मैं कैसा अनुभव करती हूं वह महत्वपूर्ण नहीं था अपितु जो साधक कष्ट में थे वे अधिक महत्वपूर्ण होते । इसलिए इस सत्सेवा को करते समय प.पू. भक्तराज महाराज की कृपा से मैं स्वयं को भूलने में समर्थ होती तथा साधक कष्ट में कैसा अनुभव करते हैं एवं उन्हें कौन सा आध्यात्मिक उपचार सबसे अधिक सहायक होगा, यह समझने का प्रयास करने के लिए साधकों पर पूर्ण रूप से ध्यान केंद्रित करती । कभी-कभी तो कई घंटों तक साधक के कष्ट न्यून होने का संकेत नहीं मिलता था । ऐसे समय मात्र उनकी कृपा से ही मैं दृढ रह पाती तथा श्रद्धा रखती और अंततः साधक को अच्छा अनुभव होने लगता । जब सुधार का थोडा भी संकेत दिखता तो उस समय होने वाले हर्ष की तुलना सबसे श्रेष्ठ सांसारिक सुख से भी नहीं की जा सकती । उन क्षणों में मैं कृतज्ञता के भाव से स्वयं को अभिभूत अनुभव करती । अब इस सेवा के विषय में सोचते समय यह कृतज्ञता उत्पन्न होती है कि प.पू. भक्तराज महाराज तथा परम पूजनीय डॉ. आठवलेजी पर्वत उठा रहे थे तथा मैं तो मात्र उसे सहारा देने के लिए एक छोटी लकडी पकडे रहती थी I”

पू. लोला के संतपद की घोषणा से पूर्व उनकी उपस्थिति में अनेक साधकों द्वारा बताई गई आध्यात्मिक उपचार से संबंधित अनुभूतियां:

  • “जिस समय वे आध्यात्मिक उपचार करतीं, सब निर्मल हो जाता तथा मुझे अत्यधिक ईश्वरीय प्रेम की अनुभूति होती । वे दिव्य प्रकाश से ओतप्रोत रहती हैं I”
  • “पिछले कुछ माह से मुझे ऐसा लगता था कि उनके माध्यम से कोई देवता आध्यात्मिक उपचार कर रहे हैं । कभी-कभी ऐसा लगता कि प.पू. भक्तराज महाराज उनके माध्यम से आध्यात्मिक उपचार कर रहे हैं । मेरे मन में यह दृढ विचार था कि वे एक संत हैं ।’’
  • उनके साथ आध्यात्मिक उपचार के समय, मुझे लगता कि जैसे वे वहां हैं ही नहीं तथा वे न तो स्त्री हैं और न ही पुरुष I”
  •  “आध्यात्मिक उपचार के सत्रों में अनेक बार मुझे बाबा (प.पू. भक्तराज महाराज) की उपस्थिति का भान होता । मुझे यह अनुभव होता कि वहां उनका (पू. लोला का) अस्तित्व ही नहीं है मात्र बाबा ही हैं । जिस समय भी हमने उनकी झलक देखी, वे सदैव निर्मल तथा पारदर्शी िदिखतीं I”

३.६ सत्संग के संचालन संबंधी सत्सेवा

अनेक साधकों को पू. लोला द्वारा संचालित सत्संगों में सम्मिलित होने से अत्यंत लाभ हुए । उनकी आध्यात्मिक प्रगति भी शीघ्रता से हुई । वर्ष २०१३ में, उनके सत्संगों से प्राप्त मार्गदर्शन तथा चैतन्य के कारण विश्व के अनेक साधकों के आध्यात्मिक स्तर में औसतन ५ प्रतिशत की वृद्धि हुई । हमने उनसे पूछा कि इस सत्सेवा को वे कैसे करती हैं ।

पूजनीय लोला : “कई वर्षों से सत्संग का संचालन करना मेरे लिए मुख्य सत्सेवा रही है तथा इन दिनों यह प्रतिदिन हो रही है । सत्संग के संचालन में पिछले कुछ वर्षों से इसके प्रति मेरा दृष्टिकोण परिवर्तित हुआ है । आरंभ में इन विचारों के साथ स्वयं पर अधिक ध्यान केंद्रित रहता था कि क्या बताना है, कोई बिंदु भूली तो नहीं आदि । उस समय सबके सामने बोलने में भी भय लगता था । सत्संग के संचालन का प्रयास करते करते भय अल्प हो गया तथा सत्संग में सम्मिलित होने वाले साधकों पर ध्यान केंद्रित होने लगा । दूसरों के प्रति अधिक ध्यान जाता तथा साधकों की प्रगति की इच्छा में वृद्धि हुई ।

“अब, सत्संग के आरंभ की प्रार्थना के उपरांत, मेरा पूरा ध्यान साधकों पर होता है तथा स्वयं के लिए कोई विचार नहीं होता । प्रत्येक साधक के लिए क्या आवश्यक है, ईश्वर इसका स्पष्ट विचार तथा भावना प्रदान करते हैं । सत्संग के समय मुझे साधकों के साथ निकटता अनुभव होती है तथा उन सबमें विद्यमान ईश्वरीय तत्त्व से एकरूपता तथा कृतज्ञता का अनुभव होता है । जो कुछ भी साधकों को बताया जाता है, मैं भी उससे सिखती हूं ।’’

“सत्संग के संचालन की सेवा का मुख्य उद्देश्य यह है कि साधक इसमें अपना स्वागत अनुभव करें, इसमें बताई बातों को समझें तथा इसका आकलन करें जिससे सत्संग में आने के लिए सभीउत्सुक/आनंदित रहें । ईश्वर की कृपा से प्रत्येक सत्संग भिन्न होता तथा वातावरण में चैतन्य होने के कारण नवीन अनुभव होता और कभी किसी को उबाऊ नहीं लगता । कभी कभी अत्यधिक धैर्य रखने की तथा प्रोत्साहन देने एवं स्पष्टीकरण बार-बार दोहरानें की आवश्यकता होती जब तक कि प्रत्येक साधक को दिया गया दृष्टिकोण समझ में नहीं आ जाता ।  सत्संग के उपरांत सभी साधक चैतन्य तथा हर्ष से भारित अनुभव करते । मुझे इस सेवा के माध्यम से साधकों के साथ निरंतर संपर्क में रखने के लिए मैं ईश्वर के प्रति कृतज्ञ हूं । मैं यह देखकर धन्य हूं कि किस प्रकार साधकों में समय के साथ साथ अच्छे परिवर्तन हो रहे हैं । ऐसा होने पर जो हर्ष मुझे अनुभव होता है वह किसी भी प्रकार के व्यक्तिगत आनंद से कई गुना अधिक है I”

४. स्वभावदोष निर्मूलन तथा दैवी गुणों को आत्मसात करना

हमने पू. लोला से यह बताने का अनुरोध किया कि उन्होंने किस प्रकार अपनी आध्यात्मिक यात्रा के दौरान स्वभावदोषों का निर्मूलन किया ।

पूजनीय लोला : “अंतः शुद्धीकरण अथवा स्वभावदोष निर्मूलन की प्रक्रिया को प्रारंभ करते समय मैं बहुत प्रसन्न हुई थी । प्रसन्नता का कारण यह था कि मैं अपने पूरे जीवनकाल में अपने दोषों को दूर करने का प्रयास कर रही थी क्योंकि मैं उनसे अवगत थी । कुछ समय सफलतापूर्वक प्रयास करने के उपरांत मेरी एकाग्रता घट जाती और मेरे दोष पुनः उभर आते । मुझे उन्हें दूर करने की प्रक्रिया को पुनः प्रारंभ करना पडता । इस प्रक्रिया को अनेक बार दोहराया । तत्पश्चात मुझे समझ आ गया कि मानसिक स्तर पर स्वयं से अपने दोषों को दूर नहीं किया जा सकता, तब मैं नहीं जानती थी कि मुझे क्या करना है I”

“उस समय, स्वभावदोष निर्मूलन प्रक्रिया बताई गई तथा इसके कारण मुझे भीतर से अनुभूति हुई कि यह प्रक्रिया कुछ अथवा अनेक दोषों को स्थाई रूप से दूर कर देगी । इसी कारण मैं बहुत प्रसन्न तथा हर्षित थी तथा स्वयंसूचनाएं देना तथा चूकें लिखना प्रारंभ किया । अभी भी मुझे लगता है कि स्वभाव दोष निर्मूलन की प्रक्रिया की अवधि में जो कुछ भी हुआ, उसे ईश्वर के चरणों में अर्पण करती हूं । उन्होंने दोषों के स्थान पर गुण निर्माण करने में सहायता की I”

हमने उनसे पूछा कि क्या अब भी उन्हें प्रतिक्रियाएं आती हैं ।

पूजनीय लोला : ‘‘अब प्रतिक्रियाएं कदाचित ही कभी आती हैं । जब प्रतिक्रियाएं आती हैं तब भी किसी प्रकार शरणागत भाव का स्तर अधिक होता है । शरणागत भाव दृढ होने से किसी प्रकार का संघर्ष अथवा अत्यधिक विचार बहुत शीघ्रता से दूर हो जाते हैं । क्या सही है इसकी समझ बहुत शीघ्र हो जाती है । आपके प्रश्न पूछने से पहले मैं इस विषय में अनभिज्ञ थी । मैं इनमें से अधिकांश बातों को नहीं जानती थी किंतु जब आपने प्रश्न किए तब मैं सोचने लगी और उसे अभी बताया I”

इसके उपरांत हमने उनसे साधना द्वारा स्वयं में दैवी गुण निर्मित करने के विषय में पूछा ।

पूजनीय लोला : “जब दोष घटते हैं तब गुण स्वाभाविक रूप से बढते हैं तथा ये प्रक्रियाएं एक साथ होती हैं । समय के साथ मुझे समझ आया कि गुणों को आत्मसार करने की प्रक्रिया वास्तव में अपनी मूल अथवा स्वाभाविक अवस्था में पुनः वापस आने की प्रक्रिया है । ईश्वर सर्वगुणसंपन्न हैं तथा यही हमारी स्वाभाविक अवस्था हैं । समय के साथ अनेक दोष निर्माण होने के कारण हम ईश्वर से अथवा अपनी उस स्वाभाविक अवस्था से बहुत दूर चले गए । जिन गुणों के लिए मैं सबसे अधिक कृतज्ञ हूं वे हैं कृतज्ञता अनुभव कर पाना, शरणागत हो पाना तथा आनंद अनुभव कर पाना । ये सभी ईश्वर के गुण हैं I”

५. अहं निर्मूलन

हमने उनसे अहं निर्मूलन के विषय में भी कुछ बताने के लिए अनुरोध किया ।

पूजनीय लोला : “यह भाव कि हम ईश्वर से अलग हैं, हमे वास्तव में ईश्वर से दूर ले जाता हैं । ईश्वर के निकट जाने के लिए हममें यह भाव अधिक से अधिक होना चाहिए कि मैं तथा ईश्वर एक ही हैं न कि यह भाव कि हम भिन्न हैं । मैं नहीं जानती कि यह प्रक्रिया कैसे होती है । मैं इसके विषय में सर्वथा अनभिज्ञ हूं । मैं मात्र यह बता सकती हूं कि तब क्या क्या प्रयास हुए थे । अनेक प्रार्थनाएं होतीं तथा अनेक बार मैं कल्पना करती कि मैं ईश्वर के सामने एक बिंदु के समान छोटी हूं । यह मुझे सदैव अत्यधिक कृतज्ञता का तथा ईश्वर के सामने बहुत विनम्र रहने का अनुभव प्रदान करता । ईश्वर जो सर्वव्यापी, सर्वज्ञ तथा सर्वशक्तिमान हैं तथा मैं उनके सामने एक बिंदु के समान हूं । इससे तत्काल ही अहं न्यून होने का भाव उत्पन्न होता । कभी-कभी मैं ईश्वर की ओर बढने की कल्पना करती और तब मैं इतनी छोटी होती जाती कि मैं पुनः एक बिंदु के समान बन जाती । तत्पश्चात मैं प्रार्थना करती और अवलोकन करती कि मुझे क्या अनुभव हुआ, मैंने कैसे प्रतिक्रिया की तथा मैंने कैसे व्यवहार किया I

“हम भाग्यशाली हैं कि हमें अहं की अभिव्यक्तियों के इतने अधिक उदाहरण बताए गए (अहं की अभिव्यक्तियों की तैयार सूची में) जिससे हम किसी भी स्थिति में स्वयं में आने वाले कोई भी ऐसे विशिष्ट विचार को जान सके कि यह अहं की अभिव्यक्ति थी । इस प्रकार अहं के विचारों का पता लगाना बहुत आसान हो जाता है तथा उपरांत उनका त्याग कर, प्रार्थना कर और स्वयं सूचनाएं देकर अहं को दूर किया जा सकता है I’’

“चूंकि अहं बहुत सूक्ष्म है हम इसके विषय में अधिक कुछ नहीं कर सकते । हम यह कर सकते हैं कि संत अथवा आध्यात्मिक रूप से उन्नत व्यक्ति हमें जो करने के लिए कहें । यदि हम उसका अनुसरण करें और हममें इच्छा है, तो ईश्वर अहं न्यून करेंगे । हम अपने अहं को किसी भी प्रकार न्यून नहीं कर सकते । यदि हममें यह इच्छा है, कि ईश्वर हमारे अहं को न्यून करें तथा हम उनकी शरण में आ जाएं और उन्हें ही करने दें तो यह प्रक्रिया बहुत आनंददायक हो जाती है । ईश्वर हमे हमारा अहं दिखने के लिए त्वरित ही स्थिति निर्माण कर देंगे क्योंकि हमें जानना अथवा स्वीकार करना आवश्यक है कि हममें कुछ अहं हैं । और जिस समय हम स्वीकार करते हैं तथा उनसे प्रार्थना करते हैं एवं जिस क्षण हम अपने अहं को ईश्वर को अर्पण करते हैं तब हम एक ही बार में अथवा धीरे धीरे उस अहं को दूर कर पाएंगें । साधना में अहं सबसे बडा बाधक है क्योंकि अहं यह भावना उत्पन्न करता है कि हम ईश्वर से भिन्न हैं ।’’

“जितना अहं कम होगा उतनी ही अधिक ईश्वर की अनुभूति होगी तथा जितना अहं कम होगा उतनी ही अधिक प्रीति अथवा ईश्वर की बनाई सृष्टि के प्रति उतना ही अधिक प्रेम होगा I”

६. प.पू. भक्तराज महाराज के प्रति भाव

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साधना के प्रारंभ से ही, पू. लोला वेजिलीच विभिन्न तरीकों से ईश्वर से जुडी रहतीं अथवा निरंतर उनसे एकरूप (ईश्वर से बातें करना) रहतीं । जिनसे वे सदैव सबसे अधिक प्रेरणा तथा जुडाव अनुभव करतीं वे हैं प.पू. भक्तराज महाराज (बाबा) जो वर्ष १९९५ से देहधारी नहीं हैं । (पू. लोला वेजिलीच ने वर्ष २००० में साधना प्रारंभ की I) यह अत्यंत असामान्य है, अतः हमने उनसे इस विषय में बताने का अनुरोध किया ।

पूजनीय लोला : “आज तक मुझे नहीं पता यह कैसे हुआ, किंतु मैं यही कह सकती हूं कि मुझे लगता है कि बाबा ने ही इस जुडाव को प्रेरित किया तथा इस संबंध को जागृत किया । अपनी साधना के अत्यधिक कठिन समय में जब मैं तनाव में थी तथा नहीं जानती थी कि आगे कैसे बढना है और जब स्थिति अनुकूल नहीं दिखाई दे रही थी तब उस समय यह संबंध किसी प्रकार और अधिक प्रबल होता गया और उनके चित्र के सामने देखने तथा नामजप करने पर मुझे प्रायः शांति अनुभव होती । जब हम भीतर से याचना करते हैं, असहाय अनुभव करते हैं तब मुझे लगता है कि जितनी अधिक कठिन परिस्थिति हमारे सामने होगी, ईश्वर से हम उतनी अधिक सहायता का आग्रह करेंगे । इस कारण मुझे यही लगता है कि वे मुझसे भी अधिक मेरे प्रत्येक विचार को जानते हैं । जो कुछ भी “मैं” कहलाता है, वे जानते हैं । मैं तो केवल उनको आत्मसमर्पित कर देती हूं । प्रारंभ में, मैं उनसे शब्दों में बातें करती थी तथा इसके पश्चात शब्दों से रहित संवाद होने लगा । वे देख रहे हैं, वे विचारों को जानते हैं तथा वे ही समस्त समस्याओं का समाधान करते हैं । यह जीवन का सबसे सुंदर नाता है I”

७. साधकों के लिए संदेश

हमारे संवाद के अंत में हमने उनसे पूछा कि क्या साधकों के लिए उनका कोई संदेश है ।

पूजनीय लोला : “मैं साधकों को अथवा जो भविष्य में साधक बनेंगे उन्हें इतना ही कहना चाहती हूं कि हमारे साधना करने से पूर्व हम एक संपूर्ण विश्व से अनभिज्ञ होते हैं । एक बार जब हम साधना आरंभ करेंगे तो हमें यह धीरे-धीरे अनुभव होगा कि हमारे जीवन के कुछ बहुत गहन तथा अति उत्तम अर्थ हैं तथा वे सभी घटनाएं जो हमारे जीवन में घटित हो रही हैं उनके रचयिता ईश्वर हैं ।

जीवन को जीते हुए हम बेहतर बन सकते हैं, हम ईश्वर के निकट जा सकते हैं, हम आनंद और शांति का अनुभव कर सकते हैं, हम दूसरों को प्यार कर सकते हैं तथा हम उन सभी वस्तुओं से प्रेम कर सकते हैं जिन्हें ईश्वर ने बनाए हैं । यह सब करने में समर्थ होने के लिए, हम सभी को बताए गए मार्गदर्शन का अनुसरण करना होगा जो कि प्रारंभ में बहुत सरल है जैसे नामजप, प्रार्थनाएं, सत्संग में सम्मिलित होना तथा थोडी-बहुत सत्सेवा करना । साधना करने पर धीरे-धीरे हम बहुत प्रसन्न तथा आनंदी बन सकते हैं । हम दूसरों को भी ऐसा बनने में सहायता कर सकते हैं I”