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१. प्रस्तावना

जब मैं छोटी बच्ची थी, तब से लडकी होना मझे मुझे अच्छा नहीं लगता था । मुझे लडका बनना चाहती थी । मैं लडकों के साथ खेलती थी क्योंकि मुझे लगता था, कि लडके स्वच्छंद वृत्ति के होते हैं रहते है, और मैं अपने आप को लैंगिक रूप से पुरूष समझने की कल्पना करती थी । जब मैं ६-८ वर्ष की थी तब मुझे बारंबार सपने आते थे, कि मुझे पुरूष का शिश्न है ।

बचपन में मैं यौन संबंधों को लेकर अति जिज्ञासु थी । जब जब मैं केवल ६ वर्ष की थी, तब ही एक लडके के के साथ मैंने पहला यौन संबंध बनाया किया । यौन दृष्टि से मुझे अन्य बच्चों की ओर देखने तथा उनके साथ खेलने में मुझे आनंद आता था । किशोरावस्था में मैं यौन दृष्टि सक्रिय हो गई । मुझे उससे सुख मिलता था । मुझे यौन उत्तेजना से सुख मिलता था तथा कभी-कभी तो उसकी उत्कट इच्छा होती । किशोरावस्था में ही मै मैं बारंबार हस्त मैथुन करने लगी थी ।

२. स्त्रीत्व की अवस्था

मुझे इसमें कुछ विचित्र नहीं लगता था; मुझे यह अपने अस्तित्व का ही भाग लगता था । बडी होकर जब मैं पढने विश्वविद्यालय (यूनिवर्सिटी)गई, तो मुझे वहां पर अनेक नारीवादी (फेमिनिस्ट), समलैंगिक समलिंगी, (लेस्बियन), उभयलिंगी (बायसेक्शुअल), पारलैंगिक (ट्रांससेक्शुअल), विचित्र (क्वीर अर्थात अप्राकृतिक यौनाचार करनेवाले तथा राजनैतिक मानसिकता के लोग भी मिले । मेरे पौगंडावस्था किशोरावस्था में मुझे मानवाधिकार तथा प्राणी अधिकारों के विषय संदर्भ में अत्यधिक रूचि थी । परंतु विश्वविद्यालय विद्यापीठ में आने के उपरांत मैं उग्र विचारधारा की हो गई और मुझे अराजकतावादी तत्वज्ञान में रुचि उत्पन्न हुई । मैं अपने हमारी विद्यालय के आवास परिसर के स्थित नारी महिला केंद्र से में बहुत अत्यधिक जुड गई । मेरे अनेक मित्र समलिंगी अथवा क्वीर(एक राजनैतिक शब्द जो सामान्य लिंग छवि जैसे – स्त्री, पुरुष, विषमलैंगिक (स्ट्रेट), समलिंगी नैसर्गिक भिन्नलिंगी के तिरस्कार में प्रयुक्त किया जाता है ।) थे । अपनी स्नातक पढ़ाई के दौरान अतिरिक्त विषय के तौर पर उसका अध्ययन किया ।

३. मेरी स्थिति को और अधिक खराब करनेवाला संबंध

मेरे पुरुष मित्र जो के साथ मेरा संबंध जैसे-जैसे बढता गया, वैसे-वैसे मेरी वेशभूषा तथा वर्त्तन और अधिक विवादास्पद, प्रायोगिक अथवा अत्याधुनिक होते जा रहा था । मैं एक स्पष्ट तथा सदैव आगे बढकर करनेवालों में से थी; किंतु मेरे व्यक्तित्व का एक पुरुषोचित्त पहलू भी था, जो कर्इ बार अति उदासीन, कठोर तथा क्रूर होता । मुझे किशोरावस्था तथा युवावस्था में अपने रूप को लेकर होनेवाले अंतर्द्वंद का स्मरण है । कभी मुझे लगता, कि मैं अपने बाल लडकों के समान बहुत छोटे कर दूं, तो कभी लगता कि बाल कमर तक लंबे करूं । २० वर्ष की आयु में मैंने अपने बाल बहुत छोटे किए और तब मेरी भेंट जो से हुई, और मेरे बाल बढने लगे । जैसे-जैसे हम एक दूसरे के साथ अधिक समय बिताने लगे, मेरे कपडे मुलायम और हल्के रंग से रुखे तथा गहरे रंगों जैसे लाल और काले रंगों में बदल गए । मैंने काँबेट जूते खरीदे और अधिक स्वच्छंद जीवनशैली के अनुसार वेशभूषा करने लगी । मैं अपने बाल छोटे काटकर उन्हें लाल, गुलाबी जैसे रंगों से रंगती ।

जो बहु यौन संबंध रखना चाहता था, जैसे मेरे अनेक मित्र कर रहे थे । इसलिए मैं भी बंधनरहित मुक्त प्रेम का अनुभव लेना चाहती थी । जो के साथ रहते हुए मैं अन्यों से भी मित्रता करने लगी । जो के साथ संबंध रखते हुए मैं अन्य पुरुषों के साथ यौने संबंध रखने लगी तथा महिलाओं से भी प्रेम सम्बन्ध का अनुभव लेने लगी । जब मैं छोटी थी तब मुझे कभी लडकियों के प्रति आकर्षण नहीं लगा, परंतु मेरे अनेक मित्र क्वीर (अप्राकृतिक यौनाचार करनेवाले) थे; इसलिए मुझे भी ऐसा आचरण प्रगतिशील लगा ।

४. समलिंगी अवस्था

ज़ो के साथ संबंध टूटने पर मैंने पहली बार लडकी के साथ संबंध रखा और उसके उपरांत मुझे केवल लडकियों के साथ संबंध रखने में ही रुचि रहने लगी । एक ओर लडकियों का साथ मुझे रोमांच का अनुभव होता था, तो दूसरी ओर उनसे यौन संबंध के समय अस्वस्थ भी लगता था । तब भी मैं अस्वस्थता की अनदेखी करती, इसलिए कि मैं अपनी इच्छा के अनुसार व्यवहार कर सकूं तथा जिसके साथ रहना चाहूं रह सकूं ।

ऐसे कई समस्यापूर्ण संबंधों के उपरांत एक प्रसिद्ध नृत्य बार में क्वीर नाईट के समय ज़ैक नामक विपरीतलिंगी (ट्रांसजेंडर) व्यक्ति से मिली । ज़ैक का जन्म महिला के रूप में हुआ था; परंतु जब हम मिले तब वह पुरुष के रूप में जीवन बिता रहा था । मुझे पुनः अस्वस्थता लगी; परंतु जैक के प्रति आकर्षण भी लगा, अतः हम एक साथ समय बिताने लगे । दो वर्ष मिलते रहने पर हम एक दूसरे के साथ रहने लगे ।

हमारे संबंध बहुत संघर्षपूर्ण तथा समस्याग्रस्त रहे । उसमें बहुत झगडे, नाटक हुए, जो अनपेक्षित था, चूंकि मैं मूलत: शांत एवं समझदार थी । तब भी मैं एक बहुत सह-परावलंबी संबंध में पड गई थी, जिससे मैं निकल नहीं सकी । ज़ैक जो मूलत: एक स्त्री था, वह अपने लिंग को लेकर, अन्य लोग, काम पर तथा परिवार वाले उसे किस प्रकार से देखते है, इसे लेकर अत्यधिक चिंता तथा तनाव से ग्रस्त रहता था । इसी कारण नौकरी में टिक पाना, पैसे कमाना उसे कठिन हो रहा था । हमारे संबंध में तनाव का यह भी एक बडा कारण था ।

(संपादकीय टिप्पणी : जेक चौथे पाताल के सूक्ष्मस्तरीय मांत्रिक से आविष्ट था । तथा कैरोलिन दूसरे स्तर के पाताल के सूक्ष्मस्तरीय मांत्रिक से आविष्ट थी । चूंकि जेक में विद्यमान सूक्ष्मस्तरीय मांत्रिक अधिक शक्तिशाली था, इसलिए उसे जेक में विद्यमान सूक्ष्मस्तरीय मांत्रिक के नियंत्रण में ही रहना पडता । कैरोलिन मन से अधिक शक्तिशाली होते हुए भी उसका प्रतिकार नहीं कर सकी ।)

वर्ष २००९ में ज़ैक और मैं भारत में उसके कुछ संबंधियों से मिलने गोवा आए । केवल ईश्‍वर की कृपा से ही हम गोवा के SSRF के आध्यात्मिक शोध केंद्र में रहनेवाले SSRF के साधकों से भेंट कर पाए ।

५. SSRF के आध्यात्मिक शोध केंद्र में रहने पर मुझे पता चला कि मैं एक पुरुष शक्ति से आविष्ट हूं

वह एक चमत्कार ही था कि साधक के सुझाव पर जैसे मैंने ईश्‍वर का नामजप करना आरंभ किया, तब ऐसा लगा कि स्वयं में विद्यमान एक शक्ति विशेषत: मेरे अनाहत चक्र से निकल रही है । ज़ैक और मुझे साधना के संदर्भ में और अधिक जानने की जिज्ञासा निर्माण हुई । हमें SSRF के आध्यात्मिक शोध केंद्र में निमंत्रित किया गया । वहां पर हमने अति शांति तथा आनंद का अनुभव किया और वहां रहनेवाले साधकों से हमें शुद्ध प्रेम मिला । हमें साधना हेतु जिसमें नामजप, आध्यात्मिक उपचार, सत्सेवा इत्यादि सम्मिलित थे, के लिए तथा सूक्ष्म प्रयोगों में भाग लेने हेतु कुछ सप्ताह वहां रहने का अवसर मिला ।

(संपादकीय टिप्पणी : सूक्ष्म प्रयोग आध्यात्मिक आयाम में किए जानेवाले आध्यात्मिक शोध का एक भाग है, जिसमें अति विकसित छठवीं इंद्रिय का उपयोग होता है।)

कुछ ही दिनों में मुझे स्वयं में कुछ परिवर्तन अनुभव हुआ और मुझे लगने लगा कि अब मैं ज़ैक के साथ कोई संबंध नहीं रखना चाहती । आध्यात्मिक शोध केंद्र में ही मैंने उससे नाता तोड दिया, और अंत में मुझे लगा कि अब मैं मुक्त हो सकती हूं और अब सही मार्ग पर चल सकती हूं।

मुझमें भावना के उद्रेक होने लगे । शक्तिशाली आध्यात्मिक उपचारों के कुछ सत्रों के उपरांत मुझे समझ में आया कि मैं अनिष्ट शक्ति से आविष्ट हूं । उसके उपरांत परम पूजनीय डॉ. आठवलेजी ने यह स्पष्ट किया कि इस जन्म में मुझे एक सूक्ष्मस्तरीय मांत्रिक ने आविष्ट किया था । मेरे बडे होने के साथ-साथ उसका नियंत्रण भी बढता गया । जब मैं सोलह वर्ष की थी तब उसकी शक्ति ५० प्रतिशत थी और २० वर्ष की आयु में वह ७० प्रतिशत हो गई । जब मैं आध्यात्मिक शोध केंद्र में आई उस समय सूक्ष्मस्तरीय मांत्रिक का नियंत्रण ७०-९० प्रतिशत हो गया था ।

तब मुझे समझ आया कि मुझ में लिंग के संदर्भ में संदिग्धता क्यों थी, (जैसे पुरुष जननांग होने की इच्छा रखना, वेशभूषा तथा केश विन्यास के प्रति विरोधक विचार करना इत्यादि)चूंकि सूक्ष्मस्तरीय मांत्रिक पुरुष था, उसके मेरे विचारों से एकरूप होने के कारण मैं अपने तथा उसके विचारों में अंतर नहीं कर पा रही थी । इस वास्तविकता से मेरे चिंताग्रस्त रहने तथा उत्तरदायित्व लेने में सक्षम न हो पाने के तनाव से मुझे राहत मिली । कुछ काल के उपरांत मुझे अनुभव हुआ कि मेरे अंतर में चलनेवाला लिंग संबंधी तथा सामान्य जीवनसंबंधी संघर्ष सूक्ष्मस्तरीय मांत्रिक से आविष्ट होने के कारण था ।

६. साधना पर ध्यान केंद्रित होना

अगले कुछ वर्षों में मेरे जीवन में कई परिवर्तन आए । मैं ३ वर्ष अकेली रही और किसी के साथ संबंध रखने की इच्छा भी नहीं हुई । मैंने साधना पर अपना ध्यान केंद्रित किया, और मुझे स्वयं में अत्यधिक आध्यात्मिक उपचार होने का अनुभव हुआ । पहले मुझमें स्वयं के विषय में असुरक्षा की भावना थी तथा चिंता तथा स्व-शंका के कारण मैं छोटे निर्णय भी नहीं ले पाती थी । परंतु अब धीरे धीरे मैं उत्तरदायी जीवन व्यतीत करने लगी हूं । मैं साधना तथा नौकरी में भी अधिक दायित्व लेने लगी; एवं परिवार के साथ भूतकाल में हुई अनेक समस्याओं पर भी मात कर सकी ।

मुझमें हुए परिवर्त्तनों को देखकर मेरे परिवारवाले भी अत्यधिक आनंदित हो गए । अब मैं अधिक शांत, समझदार एवं सामान्य हो गई हूं । मेरी मां ने बताया कि मैं जानबूझ कर ऐसे कपडे पहनती थी और ऐसे लोगों से संबंध रखती थी, जिससे उन्हें दुःख पहुंचे । मैं जानबूझकर ऐसा नहीं करती थी; परंतु अब मुझे समझ में आ गया है कि मेरा पहले का व्यवहार अनिष्ट शक्तियों से प्रभावित था ।