लिंग पहचान विकार का उपचार

१. आरंभ के वर्षों में लिंग पहचान विकार से मेरा संघर्ष

यद्यपि मैं जन्म से लडकी थी,  किंतु बचपन से ही मैं स्वयं को लडका अनुभव करती थी । मैं लडकों के खिलौने से खेलती थी । मैं चाहती थी कि मेरा शरीर अधिक हृष्ट-पुष्ट तथा पुरुषसमान बने । मैं जैसी दिखती थी, मुझे अच्छा नहीं लगता और मैं निराश हो जाती । मुझे बालिकाओं के विद्यालय में भेजा गया, जैसे-जैसे मैं बडी हुई, मेरी निराशा तथा अकेलेपन की भावना बढते गई । जब मैं सातवीं कक्षा में थी, मैं सबसे अलग ही रहती;क्योंकि मैं किसी से भी मित्रता नहीं कर पाई थी ।

जब मैं किशोरावस्था में पहुंची, तब भी मैं बहुत अकेली तथा उदास रहती थी । मेरी निराशा गहरी होती गई और मेरा घर में क्रोधित होना आरंभ हो गया । मुझे लगता था कि मैं गलत प्रकार के शरीर में फंस गई हूं । मुझे सोचती कि क्या मैं समलैंगिक अर्थात गे हूं । मैं पुरुषों समान वर्त्तन तथा वेशभूषा करती ।

बीस वर्ष की अवस्था में मैंने विपरीतलिंगी (ट्रांसजेंडर)तथा लिंग पहचान विकार ये शब्द सुने और शीघ्र ही उसकी पहचान हो गई । मैंने पुरुष की भांति जीवन जीना आरंभ किया । अपने परिवार से दूर जाने लगी क्योंकि उनमें से अधिकतर को मेरे जीवन जीने की पद्धति स्वीकार नहीं थी । ऐसी परिस्थिति में नौकरी ढूंढना कठिन था और मैं लगभग गरीबी में जीवनयापन कर रही थी । मुझे अत्यधिक चिंता होने लगी क्योंकि मुझे भय था कि लोग पहचान जाएंगे कि मैं स्त्री हूं ।

२. स्पिरिच्युअल सायन्स रिसर्च फाऊंडेशन से मेरा पहला संपर्क (SSRF)

जब मैं छुट्टियों में भारत में गोवा देखने गई थी,  तब मेरे परिवार के एक सदस्य मुझे गोवास्थित SSRF के आध्यात्मिक शोध केंद्र तथा आश्रम में ले गए । मैं पहली बार ही आश्रम गई थी । मुझे आश्रम के वातावरण में अत्यधिक सकारात्मक स्पंदन प्रतीत हुए । कुछ समय पश्चात मुझे पता चला कि आध्यात्मिक शोध केंद्र तथा आश्रम में ये स्पंदन अत्यधिक चैतन्य के कारण थे । मैं जब आध्यात्मिक शोध केंद्र में गई,  तब मेरी वेशभूषा पुरुष समान थी । मेरे साथ एक पुरुष की भांति आचरण करने का मैंने आग्रह किया । हार्मोन की औषधियां लेने से मेरे मुख पर केश थे । इससे सभी मुझे पुरुष ही समझते थे । आध्यात्मिक शोध केंद्र में सभी मेरा स्वागत कर रहे थे । कोई मुझे आकलन नहीं कर रहा था । मैंने साधना की इच्छा व्यक्त की, इसलिए उन्होंने मुझे वहां रहने की अनुमति दी । मेरे निवास काल में मैं आध्यात्मिक शोध केंद्र की सभी गतिविधियों में सम्मिलित हुई । आश्रम में बायोफिडबैक उपकरण द्वारा किए जानेवाले आध्यात्मिक शोध संबंधी अनेक प्रयोगों मैं सम्मिलित हुई । उदाहरण के लिए, लोगों के आपस में बोलने से होनेवाले परिणामों के प्रयोग में सम्मिलित हुई । मुझे एक व्यक्ति से वार्तालाप करने के लिए कहा गया । कुछ समय पश्चात मुझे बताया गया कि वह व्यक्ति संत हैं । केवल उनसे वार्तालाप करने से ही DDFAO नामक बायोफिडबैक उपकरण ने दिखाया कि मेरे कुंडलिनीचक्रों की स्थिति अच्छी हो गई है । मेरी सूक्ष्म ग्रहण करने की क्षमता से मुझे भी प्रतीत हुआ कि उपचारी प्रभाव हुए हैं ।

आध्यात्मिक शोध केंद्र के अगले कुछ सप्ताह के निवास काल में मुझे कुछ विचित्र घटनाओं का अनुभव होने लगा, जो मैंने इसके पहले कभी अनुभव नहीं किया था । उदा. भोजनपूर्व प्रार्थना करते समय मैं अपने हाथ जोड नहीं पा रही थी । मुझे लगता था कि आध्यात्मिक शोध केंद्र के भोजन कक्ष में परोसा गया भोजन ग्रहण न करूं और वहां से उठ जाऊं । मेरी विचारप्रक्रिया सुन्न हो गई थी और साधरण सी बाते मैं समझ नहीं पा रही थी । मुझे बताएनुसार मैं कुछ कर भी नहीं पा रही थी । मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि यह सब क्यों हो रहा है । कुछ समय पश्चात मुझे पता चला कि एक अनिष्ट शक्ति (भूत,  प्रेत,  पिशाच इ.) ने मुझे आविष्ट किया है । आध्यात्मिक शोध केंद्र की सात्त्विकता सहन न कर पाने से वह मेरे जीवन में इस प्रकार की बाधाएं उत्पन्न कर रही थी ।

आरंभ में मैं विचारों में अंतर समझ नहीं पा रही थी कि वे मेर विचार है अथवा अनिष्ट शक्ति के । परंतु साधना करते रहने से थोडा-थोडा करके मैं मुझमें विद्यमान दो व्यक्तित्व को पहचानने लगी । एक वह था जो इस सात्त्विकता को सह नहीं पा रहा था और दूसरा एक साधक था जो अन्य साधकों के साथ रहने से अत्यधिक आनंद में था ।

समयोपरांत मुझे पता चला कि मैं चौथे पाताल के एक सूक्ष्म स्तरीय-मांत्रिक से आविष्ट हूं । मैं समझ गई कि बचपन से ही उसके पौरुषत्व के विचारों के कारण मेरे मन में लिंग पहचान विकार उत्पन्न हुआ था । इसीलिए मुझे लगता था कि एक स्त्री के शरीर में कोई पुरुष फंस गया है । मुझे भान हुआ कि उसका अस्तित्व मेरे भीतर कालानुसार बढते गया क्योंकि उसने मेरे जीवन को अपना बना लिया था । वह मेरे माध्यम से उसकी इच्छानुसार व्यवहार करता था, इसलिए मेरे और मेरे परिवार के मध्य समस्याएं उत्पन्न हुई थी ।

३. लिंग पहचान विकार पर विजय प्राप्त करने के लिए मार्गदर्शन और साधना

मुझे सर्वप्रथम श्री गुरुदेव दत्त और पश्चात ॐ नमो भगवते वासुदेवाय का नामजप करने के लिए कहा गया । भूतावेश की तीव्रता अधिक होने के कारण मुझे अन्य आध्यात्मिक उपचारों के साथ प्रतिदिन ४ घंटे जप करने को कहा गया । मैं प्रतिदिन नमक-मिश्रित पानी तथा न्यास के साथ नामजप जैसे आध्यात्मिक उपचार करती थी । मैं SSRF निर्मित अगरबत्तियों तथा गोमूत्र से घर की आध्यात्मिक शुद्धि करती थी । स्काईप के माध्यम से सत्संग में सम्मिलित होना भी मुझे सीखाया गया । सत्संग में मैंने मेरी चूकें तथा अहं के लक्षणों को बही में लिखना सीखा । सीखने मिले सूत्र तथा मुझमें हुए आध्यात्मिक सुधार भी मैं लिखती थी । भोजन, स्नान, दुपहिए से कार्यालय में जाना, कार्यालय में काम करना, मित्रों से मिलना इत्यादि के पहले प्रार्थना करने को भी मुझे बताया गया । इन कृत्यों का लाभ उठाकर आविष्ट करनेवाली शक्ति अपना अस्तित्व बढा न सके, इसलिए प्रार्थना आवश्यक थी ।

४. परिवर्तन का आरंभ

कुछ महीनोपरांत मेरी चिंता तथा क्रोध में कमी आर्इ । मैं अपने कोष से बाहर निकली और स्त्री जैसी वेशभूषा करने लगी । मेरी शारीरिक गतिविधियां छोडी नम्र हुई और मेरा स्वर स्त्री जैसा हुआ । मुझे अनुभव हुआ कि मेरा लिंग पहचान विकार अल्प हुआ है ।

एक दिन मुझे बहुत उत्साहित और हल्का अनुभव हो रहा था और मेरे मुख पर स्मित और शांति दिख रही थी । यह एक सर्वोच्च प्रसन्नता, अर्थात आनंद की अनुभूति थी ! मैं मेरे आसपास के वातावरण से अलिप्त हो गई और उसका मुझ पर कोई प्रभाव नहीं रहा । लिंग पहचान की दृष्टि से तथा मेरे बारे में लोग क्या सोचते होंगे, इसकी मेरी चिंता अल्प हुई । मेरी आवश्यकताओं एवं रूचि के बारे में सोचने की अपेक्षा मैं लोगों की आवश्यकताओं एवं उनकी सेवा तथा उन्हें आनंद देने के संदर्भ में सोचने लगी । मुझे अंतर्मुख होकर ईश्वर के बारे में सोचना संभव होने लगा ।

छः महीनोपरांत, मुझमें यह साहस उत्पन्न हुआ कि मैं अपने अभिभावकों को यह पूछ सकूं कि क्या वे मुझे पुनः उनके परिवार में स्वीकार करेंगे ? उन्होंने हां कह दी । इस संदर्भ में मुझे एक अनुभूति हुई, जो इस प्रकार है – जिस दिन मैंने अपने माता-पिता से उपर्युक्त बात पूछी थी, उसके पहले उसी दिन मेरे माता-पिता उनके प्रार्थनास्थल गए थे और वहां के पादरी ने उन्हें कहा था कि आपकी बेटी घर लौट आएगी ।

५. वर्तमान स्थिति

माता-पिता के साथ जीवन बहुत शांतिपूर्ण रहा । मैं घर पर स्त्री समान वेशभूषा करने लगी । SSRF से जुडकर ५ वर्ष साधना करने के उपरांत एक नया सुधार मुझमें आया -पिछले सप्ताह में नौकरी के साक्ष्यात्कार में जाने के लिए मैं पूर्णतः स्त्री जैसी वेशभूषा कर सकी और उसमें मुझे बहुत अच्छा लगा । मेरा लिंग पहचान विकार लगभग जा चुका है । एक स्त्री होने के नए अस्तित्व को पाने से और स्त्री होने में ही आनंद प्राप्त होने से मैं बहुत प्रसन्न और निश्चिंत हो गई हूं ।

मेरे मूल अस्तित्व के अनुसार जीवन जी पाने के कारण मैं बहुत प्रसन्न रहने लगी हूं । ऐसा कहते हुए मैं निश्चिंत हूं और मुझे ईश्वर के प्रति कृतज्ञता लगती है । इस स्त्री देह में सुखपूर्वक जी पाने तथा अपनी आध्यात्मिक यात्रा  पर मन केंद्रित कर पाने के लिए मैं SSRF के प्रति अत्यंत कृतज्ञ  हूं । दूसरों को साधना आरंभ करने के लिए तथा चालू रखे, इस हेत प्रेरित करने के लिए मैं मेरी अपनी यह कहानी बता रही हूं । मेरा विश्वास है कि साधना करने से कोई भी लिंग पहचान विकार की समस्या पर विजय प्राप्त कर सकता है और इस प्रकार की समस्याओं पर स्थायी समाधान प्राप्त कर सकता है ।

लिंग पहचान विकार पर विजय प्राप्त करने के लिए समाधान मिला और मेरी साधना में वृद्धि हुई, इसलिए मैं ईश्वर के चरणों में कृतज्ञता व्यक्त कर यहां समाप्त करती हूं ।

– कु. आयरिन रॉजर्स, यूएसए (गोपनीयता के लिए दिया गया अन्य नाम)