भय तथा संकोच स्वभाव दोष पर आध्यात्मिक उपचारों तथा साधना द्वारा विजय प्राप्त करना

SSRF द्वारा प्रकाशित प्रकरण-अध्ययनों (केस स्टडीस) का मूल उद्देश्य है,  उन शारीरिक अथवा मानसिक समस्याओं के विषय में पाठकों का दिशादर्शन करना,  जिनका मूल कारण आध्यात्मिक हो सकता है । यदि समस्या का मूल कारण आध्यात्मिक हो,  तो यह ध्यान में आया है कि सामान्यतः आध्यात्मिक उपचारों का समावेश करने से सर्वोत्तम परिणाम मिलते हैं । SSRF शारीरिक एवं मानसिक समस्याओं के लिए इन आध्यात्मिक उपचारों के साथ ही अन्य परंपरागत उपचारों को जारी रखने का परामर्श देता है । पाठकों के लिए सुझाव है कि वे स्वविवेक से किसी भी आध्यात्मिक उपचारी पद्धति का पालन करें ।

सार :

यह प्रकरण अध्ययन स्वाति का है,  जो बचपन से ही मानसिक कष्ट से पीडित हैं । बचपन से ही उनके सभी कष्टों का मूल कारण सूक्ष्म-जगत के एक सूक्ष्म स्तरीय मांत्रिक द्वारा निरंतर किया जानेवाला आक्रमण था । यह बात तब सामने आई जब वह १६ वर्ष की हुईं । तबसे वह सूक्ष्म स्तरीय मांत्रिक के प्रभाव से निकलने के लिए साधना के साथ विविध प्रकार के आध्यात्मिक उपचार करने लगीं । अब २० वर्ष की आयु में वे अपने सभी स्वभाव दोषों तथा मानसिक कष्टों पर विजय प्राप्त करके तीन जिलों में अध्यात्मप्रसार का दायित्व संभालती हैं ।

HIN_Swathi१.परिचय

किसी में तीव्र स्वभाव दोष हो तब वह क्या करेगा, तत्पश्चात उसे यह बताया जाए कि वे स्वभावदोष मुख्य रूप से एक सूक्ष्म-स्तरीय मांत्रिक अर्थात एक शक्तिशाली अनिष्ट शक्ति के कारण है ? कोई किसी अदृश्य अनिष्ट शक्ति से युद्ध कर कैसे विजय प्राप्त करेगा ? एक व्यक्ति कैसे मानसिक तथा आध्यात्मिक दोनों आयामों के कष्टों पर विजय प्राप्त कर एक युवा नेतृत्वकर्त्ता में रूपांतरित हो सकता है, स्वाति भोसले का जीवन इसी का एक उदाहरण है ।

२. स्वाति का बचपन तथा उनके कष्ट

मुख्य समस्याएं : जहां तक स्वाति को स्मरण है, वे अत्यधिक डरपोक थीं तथा अकेले रहने से बहुत डरती थीं । वे स्मरण करते हुए बताती हैं कि उनके ये दो स्वभाव दोष विभिन्न प्रकार से प्रकट होने के कारण वे सामान्य जीवन नहीं जी सकीं । इनके साथ और भी बुरा यह हुआ कि पूरा बचपन वे बारंबार आनेवाले भयंकर स्वप्नों से घिरी रहीं ।

 

मुझे सदैव किसी के साथ की आवश्यकता होती और मैं जहां भी जाती वहां मुझे किसी का साथ चाहिए ही होता था । अनेक बार जब मेरे अभिभावक घर पर नहीं होते, मैं द्वार बंद कर लेती तथा रात्रि बल्ब जलाकर घंटों बिछावन पर पडी रहती, ऐसा था मेरा डर ! मैं कभी अपने पडोसी अथवा मित्रों से बात करने का साहस नहीं कर पाती थी । पूरा बचपन मैं बाहरी संसार से अलग रही ।

मुझे भीड से भी डर लगता । जब भी मैं भीड में जाती, तो अत्यंत तनावग्रस्त रहती । इस भय के कारण का मैं वर्णन नहीं कर सकती; किंतु मैं उन्हें टालने का अधिकतम प्रयास करती ।

मैं अपने बचपन से ही, एक ही स्वप्न बार-बार देखती । जब मैं सोती तो मुझे तीव्रता से भान होता कि मैं अपने सभी सहपाठियों के साथ एक कक्षा में बैठी हूं । अचानक कुछ व्यक्ति हाथ में छडी लिए हमारी कक्षा में आते हैं और बिना कारण हमें क्रूरता से पीटना आरंभ करते हैं । हम वहां से बच कर नहीं निकल सकते क्योंकि हमें रस्सियों से बांध दिया गया है । जैसे ही वह हमें पीटता है, हम वेदना से रोते और चिल्लाते हैं । तब चीखते-चिल्लाते मैं अपनी नींद से उठ जाती ।

अन्य स्वप्न ऐसा होता कि कोई मेरे शरीर के ऊपर बैठा है और मुझे इतना बलपूर्वक दबाने का प्रयास कर रहा है कि मैं अपने शरीर का कोई भाग थोडा भी नहीं हिला पा रही हूं । यह बहुत उलझा तथा असहाय अनुभव था । यह स्वप्न, मैं जब छठी कक्षा में पढती थी तबसे लेकर वर्ष २००४ तक प्रति वर्ष ५-६ बार आता था । वर्ष २००४ में, यह स्वप्न बढकर प्रत्येक दिन ५-६ बार आने लगा ।

बिना किसी स्पष्ट कारण के पुरुषों से बात करने में भी मुझे भय लगता । किसी भी पुरुष से बात करने से बचने के लिए मैं असंख्य मार्ग ढूंढ लेती । मैं अपने पुरुष अध्यापकों से भी कम से कम बात करती । यहां तक कि मैंने कभी अपने चचेरे भाईयों अथवा चाचा से बात नहीं की । विद्यालय पूर्ण होने तक मैंने किसी पुरुष से बात की तो वो मेरे पिता तथा भाई थे । जब तक परीक्षा लिखित स्वरूप की होती मैं पढाई में अच्छी थी;किंतु विद्यालय में मौखिक परीक्षा में मैं निराश हो जाती क्योंकि उसमें मुझे पुरुष अध्यापक द्वारा पूछे गए प्रश्‍न का उत्तर देना होता ।

शारीरिक स्वास्थ्य अच्छा न होना : ५ वर्ष की आयु तक स्वाति को पुनः-पुनः बुखार आता । विद्यालयीन वर्षों में वे किसी भी शारीरिक शिक्षण से भयभीत रहती थीं । वह सभी खेलों से सकुचातीं । एक बार उनके प्रशिक्षक द्वारा बल दिए जाने पर उन्होंने दौड में भाग लिया । किंतु वह मध्य में ही गिरकर बेहोश हो गई । कहने की आवश्यकता नहीं है कि यही अंतिम बार था कि उन्हें किसी ने दौडने के लिए कहा था । स्वाति के सभी पाठयेतर गतिविधि से अलग रहने के कारण वह लगभग एकांतवासी हो गई थीं ।

उसे समस्या है, इस वास्तविकता का सामना करना :जब स्वाति आठवीं कक्षा में थीं, तब उन्हें इस सत्य का भान होने लगा कि उन्हें व्यक्तित्व संबंधी गंभीर समस्या है । उनके अभिभावकों द्वारा उन्हें अतिरिक्त ट्यूशन के लिए नाम लिखवाने के उपरांत भी वहां न जाने के उन्होंने अत्यधिक प्रयास किए । वे जानती थीं कि नहीं जाने का कोई भी स्पष्ट कारण नहीं था ।

३. निर्णायक मोड

जब स्वाति आठवीं कक्षा में थीं, उनके एक पडोसी ने उनकी मां को स्पिरिच्युअल साइन्स रिसर्च फाऊंडेशन (SSRF)द्वारा आयोजित एक प्रवचन में आने का निमंत्रण दिया । उनकी मां ने परम पूज्य डॉ.आठवलेजी के दो कैसेट खरीदे । जब उस कैसेट को घर में बजाया गया, वह क्षण स्वाति को सदैव स्मरण रहेगा ।

 मैंने ध्यानपूर्वक कैसेट को सुना और उनके स्वर में चैतन्य की अनुभूति होने के कारण मैं स्तब्ध रह गई । वे अध्यात्म के सामान्य सिद्धांतों के संदर्भ में बोल रहे थे तथा साधना के महत्व पर बल दे रहे थे । कैसेट सुनने के उपरांत मुझे अपना कायाकल्प होने की अनुभूति हुई तथा अपने हृदय में मुझे भान हो गया कि यही वह है जो मैं अपने शेष जीवन में करना चाहूंगी ।

उन्होंने कैसेट को पुनः-पुनः सुना और इसने उन्हें जीवन में प्रथम बार अपने उद्देश्य का भान कराया था । उन्होंने जन्म के धर्मानुसार भगवान का नामजप तथा साधना प्रारंभ की, जिसे उन्होंने प्रतिदिन पांच मिनट से आरंभ कर धीरे-धीरे उसे बढाते गईं ।

४.आरोग्यप्राप्ति हेतु लंबा संघर्ष

४.१ प्रवचन तथा सत्संग में सम्मिलित होना

स्वाति SSRFद्वारा आयोजित निःशुल्क प्रवचन में सम्मिलित होने लगीं ।

मुझे स्मरण है कि जब मैं प्रथम बार प्रवचन में गई, उस समय मेरी परीक्षा चल रही थी और मैं तनावग्रस्त थी । प्रवचन के समय मुझे स्थिरता तथा स्वयं को शांति में रहने की अनुभूति हुई । जब मैं घर आई तो परीक्षा संबंधी चिंता के कोई भी लक्षण नहीं थे ।

अगले दिन, मैं परीक्षा हेतु गई और अधिक तैयारी न होते हुए भी, मैं अच्छे से परीक्षा दे पाई तथा उस विषय में मुझे अच्छे अंक मिले । इसलिए मैं अत्यधिक प्रसन्न हुई तथा नियमित रूप से साप्ताहिक सत्संगों में जाने लगी । उस समय मुझे भान हुआ कि मेरे नामजप में इतना सुधार हुआ कि किसी से बात करते समय वह होते रहता ।

इतनी अल्प कालावधि में वे नामजप के जिस स्तर तक पहुंच गई थीं, यह तथ्य इस बात का सूचक है कि उन्होंने अपने पिछले जन्म में साधना की थी । आध्यात्मिक परिपक्वता के संदर्भ में यह होता है कि हम अपने पिछले जन्म में जहां थे, इस जन्म में उसके आगे से यात्रा प्रारंभ करते हैं । यह सांसारिक कलाओंसे अलग है क्योंकि वर्तमान जीवन में हमें उन्हें शून्य से सीखना पडता है ।

दसवीं कक्षा तक आते-आते पढाई में मेरी और अधिक उन्नति हुई । इसका श्रेय मैं साप्ताहिक सत्संगों को दूंगी, जो मुझे आध्यात्मिक शक्ति दे रहे थे तथा मुझे और शांत बना रहे थे । वहां मुझे विविध आध्यात्मिक दृष्टिकोण प्राप्त हो रहे थे जिससे आगे के जीवन के संबंध में चित्र स्पष्ट होते जा रहे थे । मैं बिना किसी भय अथवा तनाव के अध्ययन कर सकती थी, परीक्षा दे सकती थी ।

किंतु इसके उपरांत एक विचित्र बात होने लगी । जब वे अध्ययन हेतु अधिक तथा साधना हेतु अल्प समय देतीं तो परीक्षा में उन्हें न्यून अंक मिलते । और जब वे साधना हेतु अधिक समय देती तब परीक्षा में भी अच्छा करतीं ।

४.२ अपनी कठिनाईयों का मूल कारण समझना

वर्ष २००२, जब स्वाति ग्यारहवीं कक्षा में थीं, तब SSRFद्वारा साधकों के लिए आयोजित एक आध्यात्मिक समारोह में सम्मिलित हुई थीं । साधकों के समूह में किए जा रहे नामजप के मध्य में ही उनका प्रकटीकरण हो गया जैसे वे किसी अनिष्ट शक्ति से आविष्ट हों । स्वाति बताती हैं कि उपरांत उन्हें समझ में आया कि उनमें विद्यमान अनिष्ट शक्ति उस आध्यात्मिक वातावरण की सात्विकता को सह नहीं पाई । क्योंकि आविष्ट करनेवाली अनिष्ट शक्ति तम प्रधान होती है तथा वह अत्यधिक सात्विक वातावरण को नहीं सह पाती । यह वैसे ही है जैसे बर्फ अग्नि की उपस्थिति में पिघलता है । हमने इसकी विस्तृत व्याख्या हमारे खंड अनिष्ट शक्तियों (भूत, प्रेत, राक्षस इत्यादि)के अंतर्गत की है । संदर्भ हेतु देखें भूतावेश के प्रकटीकरण की व्याख्या ।

SSRFके अति विकसित छठवीं इंद्रिय वाले साधक ने मुझे बताया कि मैं एक सूक्ष्म स्तरीय मांत्रिक द्वारा आविेष्ट हूं । यही सूक्ष्म स्तरीय मांत्रिक बचपन से हो रही सभी समस्याओंतथा अकथित व्यवहार के लिए उत्तरदायी था । परम पूज्य डॉ.आठवलेजी ने भी इसका सत्यापन किया । जब प्रमुख साधकों ने मुझे बताया कि अनिष्ट शक्ति का प्रकटीकरण वास्तव में उनकी आध्यात्मिक शक्ति में हो रही अल्पता का सूचक है, तो मैं चकित रह गई । फलस्वरूप उसे अपने भूतावेश की गतिविधि को त्यागकर प्रकट होना पडा । किंतु इस घटना के उपरांत मुझमें विद्यमान सूक्ष्म स्तरीय मांत्रिक का प्रकटीकरण बढ गया । पहली बार मैंने अपने जीवन में जाना था कि मैं अपने स्वभाव दोषों से छुटकारा पाने के लिए संघर्ष कर रही थी ।

यद्यपि आध्यात्मिक उपचारों के कारण अनिष्ट शक्ति प्रकट हो सकती है और व्यक्ति को छोड भी सकती है । तथापि यह अल्पकालिक हो सकता है यदि व्यक्ति आध्यात्मिक उपचार करना छोड दे तो अनिष्ट शक्ति पुनः प्रवेश कर सकती है । अनिष्ट शक्ति से लडने के लिए साधना करना तथा अपना आध्यात्मिक स्तर तथा शक्ति बढाना ही एकमात्र निश्चित मार्ग है । इसके फलस्वरूप हमें ईश्वर से उच्चस्तरीय सुरक्षा प्राप्त होती है । संदर्भ हेतु पढें – अनिष्ट शक्तियों (भूत, प्रेत, पिशाच इत्यादि) के विरुद्ध आध्यात्मिक स्तर कितनी मात्रा में सुरक्षाकवच प्रदान करता है ?

४.३ स्वाति का सूक्ष्म स्तरीय मांत्रिक से आध्यात्मिक युद्ध

आध्यात्मिक सत्र के समय, SSRFके विकसित छठवीं इंद्रिय की क्षमतावाले साधक स्वाति का आध्यात्मिक रूप से उपचार करते । साथ ही स्वाति, जितना हो सके, भगवान के नाम का जप करने का प्रयास करती । उपचार के पश्चात कुछ माह के लिए प्रकटीकरण रुक गया । तत्पश्चात स्वाति बारहवीं की परीक्षा के मध्य ही बिना किसी पूर्व लक्षण के हिंसक रूप से प्रकट हुईं । यह प्रकटीकरण इतना हिंसक था कि उनकी सुरक्षा के लिए उन्हें बांधा गया । जब SSRF के आध्यात्मिक उपचार करनेवाले विभाग ने उस पर विशिष्ट आध्यात्मिक उपचार किए, तब कहीं जाकर उनके प्रकटीकरण को नियंत्रित किया गया ।

तत्पश्चात अपनी सुरक्षा के लिए मुझे प्रतिदिन १०० माला (१०० X१०८ मणि)नामजप करने के लिए बताया गया । चूंकि उस समय परीक्षा भी थी इसलिए मैं परीक्षा हेतु प्रतिदिन २ घंटे पढाई तथा शेष समय निरंतर नामजप करती रहती ।

अपनी छुट्टियों के दिनों में वे SSRFके धामसे आश्रम में गईं, जो प्रगत आध्यात्मिक उपचार केंद्र था । यहां उन्हें पता चला कि सूक्ष्म स्तरीय मांत्रिक ने उन पर दृढ नियंत्रण पाने लिए उनके मूल दोष भय लगना का लाभ उठाया । उनके प्रकटीकरण का कारण उनका अत्यंत भयभीत होना भी था ।

नियमित साधना के अतिरिक्त उन्हें विविध प्रकार के आध्यात्मिक उपचार बताए गए थे जैसे भगवान के विशिष्ट नाम का जप करना, चमेली की लकडी, लोहबान का उपयोग करना, विभूति फूंकना, तीर्थ छिडकना, नमक-पानी का उपचार तथा किसी प्रगत साधक द्वारा किए जा रहे आध्यात्मिक उपचार में सम्मिलित होना इत्यादि ।

[कृपया प्रत्येक उपचार की कार्यविधि की प्रक्रिया के संदर्भ हेतु पढें –आध्यात्मिक उपचार खंड]

धामसे में तीन माह के इन उपचारों के उपरांत, प्रकटीकरण अल्प हो गया । इस कालावधि में एक विचित्र बात यह हुई कि मेरी अंग्रेजी की जानकारी मेरे मन से पूर्णरूप से समाप्त हो गई । मैं अक्षरों को पहचान भी नहीं सकती थी और अंग्रेजी में छपे शब्दों को देखने से भी कष्ट होने लगता था । मेरी निराशा १५-२० प्रतिशत न्यून हुई तथा आत्मविश्वास बढा । परंतु भय लगना तथा अकेले रहने में डरना जैसे मेरे मूल स्वभाव दोषों में अधिक परिवर्तन नहीं आया । इस पूरे उपचार का एक लाभ यह भी हुआ कि मेरी छठवीं इंद्रिय क्षमता थोडी विकसित हुई ।

४.४ दुर्बलता उत्पन्न करने के लिए सूक्ष्म स्तरीय मांत्रिक द्वारा स्वाति का अहं बढाया जाना

आध्यात्मिक उपचार सत्र के तीन माह उपरांत, स्वाति को SSRFके सूक्ष्मज्ञान-विभाग में सेवा करने का अवसर मिला । यह विभाग विकसित छठवीं इंद्रियवाले साधकों के लिए होता है, जो अन्य साधकों के आध्यात्मिक उपचार हेतु सहायता करने की क्षमता रखते हैं । स्वाति के आगे की उन्नति हेतु उसे SSRFद्वारा आयोजित विशेष कार्यशाला में भेज दिया गया । धामसे में यह कार्यशाला पांच दिनों की थी, जिसमें साधकों को सिखाया जा रहा था कि भाव जागृति कैसे करें तथा ईश्वर के प्रति भाव कैसे बढाएं ।

यह मेरे जीवन की सबसे अद्भुत अनुभूति है – कैसे प्रार्थना इसप्रकार की जाए कि प्रत्येक गतिविधि में ईश्वरीय अस्तित्व अनुभव प्रकट एवं जीवंत हो जाए, इसकी खोज करना ।

लगभग इसी समय सूक्ष्म ज्ञान विभाग के अन्य साधकों ने यह पता लगाया कि सूक्ष्म स्तरीय मांत्रिक ने स्वाति का अहं बढाने हेतु काम किया है । सूक्ष्म ज्ञान विभाग में उनके द्वारा गति से प्रगति करने के संदर्भ में उनका अहं बढाकर, सूक्ष्म स्तरीय मांत्रिक ने उन पर आक्रमण करने के लिए एक प्रवेश मार्ग बना लिया ।

यह महत्वपूर्ण था कि मैंने अपना अहं न्यून करने के लिए प्रयास किए । साधना तथा आध्यात्मिक उपचारों के साथ मैंने, अहं निर्मूलन हेतु सतत ८ माह तक ध्यानपूर्वक प्रयास किए । यह तीन वर्ष पहले हुआ था जब मैं १८ वर्ष की थी । इससे मेरी सारी समस्याएं २५ प्रतिशत घट गईं ।

४.५ स्वाति पर सूक्ष्म स्तरीय मांत्रिकद्वारा शारीरिक आक्रमण

तीन ओर से प्रयास अर्थात आध्यात्मिक उपचार, भाव वृद्धि हेतु प्रयास तथा अहं निर्मूलन के कारण स्वाति के संकोची तथा भय लगने जैसे स्वभादोष अल्प होने लगे ।

 इस कालावधि में मैं भारत के गोवा स्थित फोंडा क SSRFके आश्रम में रहने लगी । वहां वर्ष २००३ में परम पूज्य डॉ.आठवलेजी ने एक दिन कहा था कि मैं आनंद की अनुभूति लूंगी तथा शीघ्र ही मुझे यह सब सत्य होने का भान हुआ ।

अगस्त २००५ में स्वाति को स्वस्थ होने में एक अडचन आई । सूक्ष्म स्तरीय मांत्रिक स्वाति को अचेतन अवस्था में पहुंचा देता । अनिष्ट शक्ति रात्रि में सूक्ष्म से उसका यौन शोषण करती । यह तब भी होता जब वह अपनी सहसाधिकाओं के साथ सोती थीं । शरीर पर इसका प्रभाव सूजे हुए होंठ इत्यादि के रूप में दिखते । चेतना में आने के उपरांत उन्हें अत्यधिक निराशा होती । यह कष्ट परम पूज्य डॉ.आठवलेजी द्वारा किए गए आध्यात्मिक उपचारों से न्यून हुआ तथा यह घटना चार माह के उपरांत पुन: हुई । तब परम पूज्य डॉ.आठवलेजी ने उन्हें भारत के गोवा स्थित SSRF के मुख्य केंद्र जहां वे रहते हैं वहां बुलाया तथा उस पर बडे पैमाने पर आध्यात्मिक उपचार किए । जिससे अंततः वे ठीक हो गईं ।

५. दृढता में उत्तरोत्तर वृद्धि

पिछले दो वर्षों से स्वाति के स्वभाव में आमूल परिवर्तन हुए हैं । वे ना तो संकोची रहीं ना ही अब उन्हें अकेले रहने से भय लगता है । जब तक सूक्ष्म स्तरीय मांत्रिक का नियंत्रण पूर्णरूप से समाप्त नहीं कर दिया गया, तब तक उन्हें अनुभव होनेवाले कष्ट नियंत्रण में हैं ।

मैं समझ गई कि सूक्ष्म स्तरीय मांत्रिक को अपने पर नियंत्रण करने से रोकने के लिए मुझे नियमित साधना तथा आध्यात्मिक उपचारों को गंभीरता से करना होगा । समय के साथ ये उपाय सूक्ष्म स्तरीय मांत्रिक की समस्या को भी पूर्ण रूप से ठीक कर देंगे ।

सूक्ष्म स्तरीय मांत्रिक अत्यधिक बलशाली अनिष्ट शक्ति होते हैं, जो अपनी असीमित आध्यात्मिक शक्ति के कारण प्रेतबाधा से मुक्त करवाने हेतु किए जानेवाले तंत्र-मंत्र को झेल सकते हैं । अपनी आध्यात्मिक शक्ति के भंडार को भरते रहने के लिए वे सतत साधना करते रहते हैं । केवल आध्यात्मिक उपचारों के निरंतर प्रहार से सूक्ष्म स्तरीय मांत्रिक की आध्यात्मिक शक्ति क्षीण होती जाती है और अंततः वह उसे छोड कर चला जाता है । अध्यात्म के छः मूलभूत सिद्धांतों के आधार पर की गई नियमित साधना ही अनिष्ट शक्तियों से सुरक्षा प्राप्त करने का एकमात्र उपाय है ।

अब स्वाति पूर्व की भांति संकोची तथा डरपोक नहीं रहीं । मैं अब अधिक खुली तथा आत्मविश्वास से पूर्ण हूं । मैं अभी भारत के तीन जिलों के अध्यात्मप्रसार की सारी गतिविधियां देखती हूं । यह सब मैं ईश्वरप्राप्ति हेतु साधना के रूप में निःशुल्क करती हूं । अपने उत्तरदायित्व के कारण प्रतिदिन मुझे स्त्री तथा पुरुष दोनों से बडी संख्या में संपर्क करना पडता है । अनेक बार मुझे विशाल भीड को संबोधित करना पडता है । कभी-कभी मुझे अपनी आयु के दुगुनी अथवा तिगुनी आयु के लोगों को व्यष्टि तथा समष्टि साधना संबंधी मार्गदर्शन करना होता है । अनेक बार मुझे त्वरित निर्णय लेना होता है, जिससे अनेक लोग प्रभावित होते हैं । ईश्वर की कृपा से ये सब संभालना मुझे सहज लगता है ।

स्वाति अपने आरोग्यप्राप्ति को परम पूज्य डॉ.आठवलेजी का संकल्प तथा उनकी कृपामय हस्तक्षेप को समर्पित करती हैं । वे कहती हैं कि साधना तथा आध्यात्मिक उपचारों के संदर्भमें उनके मार्गदर्शन के कारण ही आज वे ऐसी हैं ।

यह लगभग ४-५ वर्षों की एक लंबी प्रक्रिया रही;किंतु इससे समस्त कष्टदायक लक्षणों से पूर्णरूपेण छुटकारा मिली । अभी भी मुझे प्रभावित करनेवाले सूक्ष्म स्तरीय मांत्रिक से पूर्ण रूप से मुक्त होना है; किंतु मुझे विश्वास है कि समय आने पर यह भी होगा ।